पुलिस की नाक के नीचे वर्षों से चल रहा गौकशी का अवैध बूचड़ खाना, आखिर आदिवासी संगठन के लोगों ने अचानक से क्यों किया उजागर
माही की गूंज, झाबुआ।
आदिवासी बाहुल जिले में गौकशी या गौ-हत्या के मामले कोई नए नहीं है। ऐसे ही मामले दशकों में कई बार मीडिया की सुर्खियों में आसानी से देखने और सुनने को मिलते रहे है। इन सभी मामलों में अक्सर होता यही रहा है कि, गौ-हत्या हो जाने के बाद ही हंगामा होता है और पुलिस पहुंचती है। आखिर ऐसा क्यों है कि, पुलिस या प्रशासन को ऐसे मामलों की खबर पहले नहीं लगती...? या फिर जिले की पुलिस व प्रशासन गौ-हत्या जैसे गंभीर मुद्दों पर अपनी नजरें पैनी करना ही नहीं चाहता। जब-जब भी गौकशी के मामले उजागर होते है उसके बाद ही पुलिस व प्रशासन लाठी पीटता दिखाई देता है। जिले में हो रही इस तरह की घटनाएं पुलिस व प्रशासन पर कई गंभीर सवाल खड़े करती दिखाई देती है। क्या पुलिस का खुफिया तंत्र इन मामलों में सुन्न हो जाता है...? या फिर पुलिस की मुखबिरी जेब भरने वाले मामलों में ही काम करती है...? हालांकि देखा जाए तो पुलिस की कार्यप्रणाली जिले में हमेशा से ही सुस्त दिखाई दी है। चाहे फिर वह चोर-उच्चकों का मामला हो या फिर डकैती का, अवैध मादक पदार्थों का मामला हो या फिर अवैध शराब का। हमेशा से ही जिले की पुलिस व प्रशासन की कार्यप्रणाली शंका के घेरे में ही दिखाई दी है। कई मामलों में तो पुलिस ‘तील का ताड़ तो राई का पहाड़’ करती नजर आती है तो कई बड़े और गंभीर मामलों को ‘ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।’ ऐसे ही मामलों में एक आता है गौकशी और गौ-हत्या का खेल। पिछले कुछ दशकों पर नजर डाले तो यह पता चलता है कि, जिले की पुलिस गौ-हत्या और हत्यारों के प्रति कितनी सख्त है...? गौकशी के मामलों में पुलिस मामला तो दर्ज करती है, लेकिन पकड़े जाने वाले अपराधी महज कुछ समय में ही जेल से रिहा होकर या जमानत पर फिर उसी धंधे में लग जाते है।
विडम्बना यह कि, गौ-हत्या के अधिकांश मामले उजागर करने में पुलिस की कोई अहम भूमिका जिले में अब तक दिखाई नहीं दी है। जिले में गौकशी के अधिकतर मामले या तो हिन्दू संगठनों द्वारा या फिर किसी सामाजिक संगठन द्वारा उजागर किये जाते रहे है। इस तरह के संगठन खुद अपने बूते जिले में हो रही गौ-हत्या के मामले उजागर करते है। मगर इसमें भी एक संदेह है जो इन संगठनों पर भी सवाल खड़े करता है। असल में जिले में हो रही गौकशी के मामलों मेें अक्सर यह देखने में आया है कि, यह घटनाएं अक्सर ग्रामीण इलाकों में ही होती है। जब-जब इस तरह के मामले उजागर होते है तब-तब यह पता चलता है कि, यह काम फलां जगहों पर तो वर्षों से हो रहा था। घटना स्थल से सैकड़ों गौवंश के अवशेष भी बरामद होते है। अब सवाल यह भी उठता है कि, अचानक कोई संगठन इस तरह के मामले उजागर करता है जो लंबे समय से संचालित होते है। आखिर संगठन व उनसे जुड़े लोगों को लंबे समय से चल रहे गौकशी के मामलों की सूचना पहले क्यों नहीं मिलती...? और मिलती भी है तो पहले इन संगठनों व उनके लोगों को ही क्यों मिलती है...? पुलिस व प्रशासन को क्यों सीधे तौर पर इस तरह के मामलों में सूचना नहंी मिलती...? इसके पीछे भी एक लंबी कहानी है।
सुत्रों की माने तो ऐसा नहीं है कि, इस तरह के अधिकतर मामलों में संघ, संगठनों को अचानक से ऐसी कोई सूचना मिलती है। यह सब तो उन्हे पहले से ही पता होता है। बात तो सिर्फ सेटिंग की है। जब तक संघ, संगठनों के पदाधिकारियों की मांग पूरी होती रहती है तब तक सबकुछ अच्छे से चलता है। जब इनकी मांग पूरी नहीं होती तो फिर मामले उजागर हो जाते है। अधिकतर मामलों में यही होता है।
अंदरखाने की खबर रखने वाले बताते है कि, ऐसा नहीं है कि कोई भी कहीं भी ग्रामीण क्षेत्र में खुलेआम या दबे-छुपे गौ-हत्या कर देता है। इन मामलों में गौ-हत्यारों को खुलेआम क्षेत्रवासियों का सामाजिक संरक्षण मिलता है। गौकशी ग्रामीण क्षेत्रों में जहां भी होती है वहां कोई ना कोई क्षेत्रवासी अपने घर या झोपड़े में गौकशी करने वालों को बकायदा जगह देता है। ऐसा नहीं है कि, गौ-हत्या करने वालों को सिर्फ एक व्यक्ति का संरक्षण होता है। बल्कि गांव के अधिकांश लोग इसे खुला और मौन समर्थन या स्वीकृति देते है। गांव में कोई घटना हो और किसी सरपंच को या कोटवार को या तड़वी को इसकी खबर ना हो इस जिले में ऐसा हो पाना शायद नामुमकिन है...! जब गौकशी सार्वजनिक और सामाजिक स्वीकृति या समर्थन के होती है, तो गांव में रसूख रखने वाले हर एक को उसका हिस्सा मिल जाता है। एक कहावत है कि ‘‘बकरा कटेगा तो सबमें बटेगा’’ बस ऐसा ही कुछ है।
नाम ना बताने की शर्त पर गौ-तस्करों के आसपास रहने वाले बताते है कि, यह मामला इतना सीधा नहीं है जिनता कि आप समझते है। बात बहुत ही पैंचीदा और उलझी हुई है। सिर्फ एक अंदाजा लगाइए कि जिले में कितने मवेशी बाजार लगते है। इनमें कितना मवेशी बिकने आता है और कितना गौवंश बिकता है...? इसका हिसाब आखिर किसके पास है...? यह कौन जानता है कि, मवैशी किसी पशु पालक ने खरीदा है या वह कटनी के लिए खरीदा गया है...? क्योंकि कटनी का माल भी इन्ही बाजारों से खरीदा जाता है कोई आसमान से नहीं उतरता। गौवध के इस गौरख धंधे में कोई भी गौतस्कर या कसाई या खटिक खुले तौर पर मवेशियों की खरीदी नहीं करता। उनके पास इस काम के लिए कई ऐसे लोग है जो जिले के ही है और आदिवासी है। वे कमीशन बैस पर इन्हे मवेशी खरीदकर देते है। इनकी जिम्मेदारी इतनी होती है कि, ये मवेशी बाजार से खरीदकर ठेठ ठिकाने तक पहुंचाते है। स्थानीय होने और आदिवासी या किसान होने के चलते कोई इनको रोकना तो ठीक शक भी नहीं करता।
इसके अलावा जिले की अधिकांश आदिवासी आबादी अब धर्मांतरित हो चुकी है। धर्मांतरित आदिवासी खुले तौर पर मांसाहार का समर्थक ही नहीं करते बल्कि सेवन भी करते है। इस स्थिति में अब यह चलन भी हो चला है कि, कहीं से खरीदने के बजाय अपने बीच के लोगों से सीधे मवेशी खरीद लिए जाए और आपस में मांस के हिस्से कर लिए जाए। जिसे स्थानीय भाषा में ‘‘बाटा पाड़ना’’ कहा जाता है। ऐसे मामलों में अक्सर गौमांस का ही बंटवारा होता है। मामला अपनों के बीच ही खत्म हो जाता है और किसी को इसकी खबर भी नहीं लगती। जिन गांवों में बहुसंख्यक धर्मांतरित आदिवासी रहते है वहां इस तरह से गौकशी होना कोई नई बात नहीं है। क्योंकि जब-जब भी जिले में बड़े गौ-हत्या कांड का पर्दाफास हुआ है वह इसी तरह के ग्रामीण क्षेत्रों से हुआ है। जहां धर्मांतरित आदिवासियों की संख्या बहुतायत है। चाहे फिर वह सजेली नानिया सात हो या फिर झाबुआ के समीप मोहनपुरा। यह समानता अक्सर इन मामलों में देखने को मिल ही जाती है।
मोहनपुरा गौ-हत्या कांड में जिन आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया है उन्हे भी उसी क्षेत्र के ग्रामीणों ने स्वीकृति या मौन समर्थन दिया ही होगा। क्योंकि बताया जाता है कि, इस क्षेत्र में लंबे समय से गौकशी का काम चल रहा था। लंबे समय तक इस तरह की गतिविधि बिना किसी संरक्षण, समर्थन के चल ही नहीं सकती। रही बात इस गौ-हत्या से पर्दाफास करने वाले संघ, संगठनों व उनके पदाधिकारियों की तो उनकी नियत राम जाने...! मोहनपुरा के स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार इस तरह की मांस की दुकान तो यहां वर्षों से चली आ रही है। कोरोना काल में जब सबकुछ बंद था तब भी यहां मांस की दुकान चालू थी। उस समय ठेठ झाबुआ और दूर-दूर से लोग यहां गौ मांस खरीदने आते थे। ग्रामीणों ने कभी कोई आपत्ती नहीं ली। गांव के अधिकांश लोग भी गौ मांस का सेवन करते है।
कुल मिलाकर जिले में हो रहे गौ-हत्या मामलों में अपराधियों को स्थानीय लोगों का खुला समर्थन और मौन स्वीकृति देखी जा सकती है। पुलिस और प्रशासन निरंक है, तो मामले उजागर करने वाले संघ, संगठन भी शंका के घेरे में है।
मोहनपुरा गौहत्या कांड में पांच आरोपियों पर पुलिस ने फिलहाल मामला दर्ज कर लिया है जिनमें से चार को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है और एक आरोपी अब भी फरार है। आरोपियों के खिलाफ गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4,5,9 आर्म्स एक्ट की धारा 25 (बी) और बीएनएस की धारा 325 के तहत प्रकरण दर्ज किया है। जिला प्रशासन ने आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत कार्रवाई करते हुए चारों आरोपियों को तीन माह के लिए केंद्रीय जेल इंदौर मे भेजने के आदेश जारी किए है।
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