सरकारी भवन होने के बावजूद निजी घर से हो रहा दुकान का संचालन, ग्रामीणों ने उठाए सवाल
माही की गूंज, खवासा।
ग्राम पंचायत परवाड़ा में शासकीय उचित मूल्य की दुकान के लिए 12 लाख रुपए से अधिक की लागत से निर्मित किया जा रहा गोदाम अब तक अधूरा पड़ा हुआ है। वहीं दूसरी और शासकीय उचित मूल्य की दुकान का संचालन सरकारी भवन में होने के बजाय निजी घर से किया जा रहा है। ऐसे में शासन द्वारा ग्रामीणों की सुविधा के लिए बनाए जा रहे भवन का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में नजर आ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि, शासन की राशि खर्च कर यदि उचित मूल्य दुकान के लिए भवन तैयार किया गया है तो उसका उपयोग सार्वजनिक हित में होना चाहिए। लेकिन भवन का निर्माण पूर्ण नहीं होने के कारण ग्रामीणों को अभी भी उचित मूल्य की दुकान के लिए निजी मकान का रुख करना पड़ रहा है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी बनी हुई है।
लोगो से मिलीजानकारी अनुसार शासकीय उचित मूल्य की दुकान का संचालन, दुकान संचालक द्वारा अपने निजी घर से किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि, जब शासन ने दुकान के लिए अलग भवन निर्माण की स्वीकृति देकर लाखों रुपए खर्च किए हैं तो फिर दुकान का संचालन सरकारी भवन में क्यों नहीं किया जा रहा है? आखिर निर्माण कार्य पूरा कराने और सरकारी भवन को उपयोग में लाने की जिम्मेदारी किसकी है?
लाखों खर्च के बाद भी भवन का लाभ नहीं
शासन द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक सुविधाओं के लिए बड़ी राशि खर्च की जाती है, लेकिन समय पर निर्माण कार्य पूरा नहीं होने तथा भवनों का उपयोग शुरू नहीं होने से योजनाओं का वास्तविक लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंच पाता। परवाड़ा में भी ऐसा ही मामला सामने आने की बात ग्रामीणों द्वारा कही जा रही है।
परवाडा पंचायत के लोगो का कहना है कि, संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर निर्माणाधीन भवन की स्थिति का निरीक्षण करें और अधूरे पड़े गोदाम का निर्माण कार्य जल्द पूरा करवाकर शासकीय उचित मूल्य की दुकान का संचालन उसी भवन से शुरू करवाया जाए।
भवन बनने से लेकर अब तक कई तरह की कमियां दिख रही है, भवन में अभी से ही सरिया दिखाई दे रहे हैं, तो माल मटेरियल का भी सही उपयोग नहीं हुआ।
जो भवन बनाया गया है, उसमें कई तरह की अनियमिता सामने दिखाई दे रही है। शुरूआती भवन निर्माण के कार्य से ही इसमे कमियां नजर आ रही है, लेकिन फिर भी जिम्मेदार सब इंजीनियर ने इस और कोई कार्रवाई नहीं की, ना ही ग्राम पंचायत के अधिकारियों ने इस और देखना उचित नहीं समझा। और ठेकेदार ने अपने मनमर्जी अनुसार कार्य किया। जिससे यह भवन बनने से पहले ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है।
वही ग्राम पंचायत में जो भी निर्माण होते हैं उसकी देखरेख करने के लिए सिविल इंजीनियर के साथ असीटेंट इंजीनियर की भी जिम्मेदारी होती है कि वह भी इस और ध्यान दे। लेकिन यहां तो मामला कुछ और ही नजर आ रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं की सब मिलकर बंदर बाट कर रहे हैं? ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि, पूरे मामले की जांच कर भवन निर्माण की वास्तविक स्थिति, खर्च हुई राशि तथा दुकान संचालन की व्यवस्था की जानकारी सार्वजनिक की जाए और यदि कहीं लापरवाही सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
मामले में सिविल इंजीनियर नवलसिंग बडोले से चर्चा की तो बताया, मुझे आए हुए सालभर हुआ है और उसकी एक किस्त ही जारी हुई है, दूसरी किस्त अभी मिली नहीं है। इसलिए कार्य अधूरा पड़ा हुआ है जैसे ही दूसरी किस्त जमा होती है तो हमारे द्वारा कार्य शुरू कर दिया जाएगा। उसके बाद उन्होंने कोई भी प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।

शासकीय उचित मूल्य का अधूरा भवन।
