माही की गूंज, झाबुआ।
झाबुआ जिला आमतौर पर कांग्रेस का गढ़ कहा जाता रहा है। 2003 के विधानसभा चुनाव को अपवाद स्वरूप छोड़ दे तो अधिकांश समय यहां कांग्रेस का पलड़ा ही भारी रहा। यही नहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां पहली बार लोकसभा चुनाव जीता लेकिन महज डेढ़ साल में ही सांसद दिलीप सिंह जी भूरिया के निधन के पश्चात हुए उपचुनाव में भी कांग्रेस ने वापसी की। वो वापसी इसलिए भी खास थी कि, तात्कालिक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने लगभग 50 से ज्यादा सभाएं की थी और बावजूद इसके भाजपा प्रत्याशी निर्मला भूरिया को करारी हार का सामना करना पड़ा था। यहां भाजपा प्रत्याशी निर्मला भूरिया को उनके पिता के निधन के बाद भी सहानुभूति का लाभ नहीं मिला था। इस हार के पश्चात तात्कालिक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि, झाबुआ जिला परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ़ रहा है। यही नहीं 2023 के विधानसभा चुनाव में भी जब प्रदेश में भाजपा ने 230 में से 166 सीटे जीती थी तब भी जिले की तीन में से दो सीटे कांग्रेस ने जीतकर यह साबित किया था। जिले में कांग्रेस की जड़े मजबूत है लेकिन 2026 के जिला पंचायत के वार्ड चुनाव में आम जनता ने कांग्रेस और भाजपा समर्थित दोनों ही दलों के प्रत्याशी को नकारते हुए तीसरे विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी के जिला अध्यक्ष कमलेश सिंगाड को चुना। जीसके बाद यह चर्चा जोरो पर है कि क्या झाबुआ जिले की जनता तीसरे विकल्प की तलाश में है...? अतीत में अगर देखे तो यहां कलसिंह भाभर निर्दलीय रूप से विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन वह जीत कहीं न कहीं व्यक्तिगत जीत के रूप में देखी गई ह थी। वहीं पिछले जिला पंचायत के चुनाव में भी वार्ड नंबर 9 में जयस समर्थित रेखा निनामा ने अप्रत्याशित रूप से जीत दर्ज की थी। तब भी यही कहा जा रहा था कि, जिले में जनता कांग्रेस और भाजपा के अलावा अन्य तीसरे विकल्प की तलाश में है। हालांकि रेखा निनामा के इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने यह सीट पुनः प्राप्त कर ली जिसके बाद अटकलो पर विराम लग गया। लेकिन हाल ही में हुए उपचुनाव के परिणामों ने एक बार फिर इन अटकलो को हवा दे दी है। हालांकि यह उपचुनाव गैर दलीय आधार पर हुए थे लेकिन दोनों ही प्रमुख पार्टियों ने इस चुनाव को पूरी गंभीरता के साथ लड़ा था। बकायदा अधिकृत उम्मीदवार घोषित किया गया था और जोर-शोर से चुनाव प्रचार भी किया गया था।
भाजपा ने 23 पंचायतो के लिए 23 प्रभारी तक नियुक्त किए थे लेकिन बावजूद इसके जनता से दोनों ही प्रमुख दलों के दावे को नकारते हुए तीसरे विकल्प को चुना। जो कि दोनों ही दलों के लिए खतरे की घंटी है। इस आम चुनाव के परिणामो का असर वर्तमान राजनीति पर भले ही न पड़े लेकिन इसका असर आगामी स्थानीय निकायों के चुनाव व विधानसभा चुनाव पर पढ़ना निश्चित है। दोनों ही दलों के लिए यह परिणाम आत्मचिंतन का विषय अवश्य ही है। विशेष रूप से कांग्रेस के लिए यह चुनाव बहुत ही प्रतिष्ठा का विषय था क्योंकि इस वार्ड में उसके दो प्रतिष्ठत नेताओं पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया तथा वर्तमान विधायक डॉ विक्रांत भूरिया की गृह पंचायत का क्षेत्र भी था। लेकिन कांग्रेस इन वरिष्ठ नेताओं की ग्रह पंचायत में भी बढ़त नहीं ले सकी जो कि उसके लिए चचिंतनीय है कि आखिर चुक कहां हुई।
वहीं भाजपा के लिए खतरे की घंटी इसलिए है कि पार्टी, केंद्र और राज्य में सत्ताधीश है और उपचुनाव में प्रचार के लिए नेताओं की फौज तैनात कर दी थी तथा भाजपा जिलाध्यक्ष भानु भूरिया का भी ग्रह क्षेत्र था बावजूद इसके भाजपा यह सीट नहीं जीत पाई। जिसके बाद आम जनता का कहना है कि, चुनाव में नेता नहीं कार्यकर्ता वोट दिलाते हैं अब जबकि उपचुनाव के परिणाम आ चुके हैं दोनों ही दलों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। आम जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को आजमाने के बाद अब तीसरे विकल्प की और आशा-भरी निगाहों से देख रही है। जो परंपरागत राजनीति से हठकर आम जनता के मुद्दों पर जनता के साथ खड़ी रहे। आम आदमी पार्टी के जिलाअध्यक्ष कमलेश सिंगाड़ के बारे में भी यही कहा जा रहा है कि वे जरूरत के समय आम जनता के साथ खड़े होते हैं। हालांकि महज एक उपचुनाव के परिणाम के आधार पर आगामी राजनीति या जनता के मूड का आकलन करना कठिन है। लेकिन फिर भी आम जनता ने अपना फैसला सुना कर दोनों ही दलों को आत्मचिंतन का अवसर अवश्य दिया है। अब देखना ये है कि, दोनों प्रमुख दल इस परिणाम का उपयोग अपनी गलतियां सुधारने में करते हैं या इसे महज इफ्तेफाक समझकर अपने पुराने राजनीति दर्रे पर ही चलकर आगामी चुनाव में उतरते हैं...?
बहरहाल इस उपचुनाव के एक परिणाम ने कई संदेश देकर दोनों ही दलों को चैकन्ना अवश्य कर दिया है और यह भी साबित कर दिया है कि, राजनीति में किसी को भी कमजोर आंकने की भूल नहीं करना चाहिए। राजनीति में कौन कब और किसको मात दे दे कहां नहीं जा सकता है।

झाबुआ जिले का अगला चुनावी तिसरा विकल्प यह रह सकते है...
