सिविल हॉस्पिटल में कुछ भी सही नहीं, डॉक्टर कलेक्टर को भी नहीं है आम मरीजों की चिंता
माही की गूंज, पेटलावद।
सरकार की व्यवस्थाओ का मजाक अगर देखना है तो सिविल हॉस्पिटल पेटलावद सबसे अच्छा स्थान माना जाएगा। जहां मरीजों के स्वास्थ के साथ इलाज के नाम पर खिलवाड़ होता है। कहने को तो करोड़ो का भवन है, लिफ्ट, डिजिटल एक्सरा मशीन, इमरजेंसी वार्ड, ब्लड जांच, आईसीयू वार्ड सब है लेकिन सब अब असुविधा का शिकार होकर मरीज और उनके परिजनों के लिए मुसीबत बन चुके है। सरकार की ओर से मिलने वाली फ्री इलाज की सुविधा भी लेनी है ओर मजबूरी है कि पैसा खर्च करवा के इलाज भी करवाना है। स्थिति इतनी गम्भीर हो चली है कि, पेटलावद सिविल हॉस्पिटल सिर्फ असुविधाओं ओर वसूली विवाद को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। यहां मरीजों के इलाज के नाम मौजूद डाक्टरों का ऐसा कोई बड़ा काम नहीं है जिसने अच्छे काम के लिए उनको याद किया जाए।
सवा लाख की ईसीजी मशीन तक नहीं, डायलिसिस, सोनोग्राफी मशीन खा रही धूल
करोड़ो के सिविल हॉस्पिटल भवन में सरकारी व्यवस्था मरीजों के प्रति कितनी चिंता और कितनी सजग हैं इससे ही पता चलता है कि, वर्तमान में सबसे ज्यादा हार्ट अटैक के मरीज आने लगे हैं। दिल के दौरे से संबंधी मरीजों को आते ही अन्यत्र रेफर कर दिया जाता है , इनकी जांच के लिए मामूली रकम सवा से डेढ़ लाख की कीमत की ईसीजी मशीन तक सिविल हॉस्पिटल में उपलब्ध नहीं है। मरीजों को पांच सौ से लेकर हजार रुपए तक केवल ईसीजी जांच के लिए खर्च निजी हॉस्पिटलों या बाहर के हॉस्पिटलो में जाना पड़ता है। सिविल हॉस्पिटल में सबसे ज्यादा मामले डिलेवरी के आते है जिसके लिए गर्भवती महिलाओं को नो माह तक सरकारी अस्पताल में जांच के लिए आना पड़ता है। और इस गर्भावस्था काल में तीन से चार बार सोनोग्राफी की आवश्यकता होती है, जिससे गर्भवती महिला की डिलेवरी की स्थिति साफ होती है। भगवान भरोसे चल रहे इस सिविल हॉस्पिटल में ये सुविधा तक नहीं है।
हमारे सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, हॉस्पिटल में सोनोग्राफी मशीन उपलब्ध है लेकिन उसके संचालन के लिए कोई डॉक्टर नहीं है। और तो और यहां निजी हॉस्पिटलों का इतना प्रभाव है कि इस सुविधा के संचालन के लिए कोई प्रयास नहीं किया जाता। जबकि पूरे गर्भावस्था के कालखंड में एक परिवार पर सोनोग्राफी के लिए चार से पांच हजार रुपए निजी हॉस्पिटलों में खर्च करना पड़ता है।
डायलिसिस के मरीजों के लिए तो सत्ता के नेताओं ने खूब तालियां बटोरी, बड़े-बड़े समाचार मीडिया में प्रकाशित करवा कर वाहवाही लूटी कि अब डायलिसिस के मरीजों को अन्य स्थानों पर नहीं जाना पड़ेगा। वही डायलिसिस की मशीन को हॉस्पिटल में पहुंचे 6 माह से अधिक समय बीत गया है लेकिन अब तक मशीन शुरू तो ठीक फिट भी नहीं हो पाई। मशीन के संचालन के लिए अनुभवी कर्मचारी की भर्ती तक नहीं की गई। ऐसे में आने वाले कुछ समय में ये सुविधा भी लोगो को मिले इसकी उम्मीद बहुत कम है।
डॉक्टर कलेक्टर के दावे भी फैल, कोई सुविधा ठीक नहीं
जिले को मिले नए कलेक्टर तुकाराम भरसट खुद एक डॉक्टर है उनके आने के बाद एक उम्मीद जगी थी कि, कम से कम जिले की स्वास्थ्य सुविधाओं में बहुत बड़ा सुधार होगा लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा। कलेक्टर साहब के सिविल हॉस्पिटल के दौरे पर डायलिसिस मशीन को दो माह में शुरू करवाने की बात कही थी लेकिन नतीजा शून्य ही रहा। विकास खंड स्तर पर हुई जन सुनवाई में डायलिसिस पीड़ित मरीजों ने दुबारा ये मांग डा. कलेक्टर साहब के सामने रखी लेकिन अब तक मशीन फिट तक नहीं हुई।
अन्य सुविधाओं की स्थिति भी गंभीर है। सिविल हॉस्पिटल में आधे समय तो एक्सरा तक नहीं हो पाता। क्योंकि यहां कर्मचारी ड्यूटी टाइम के बाद मौजूद तक नहीं रहते। जिसका एक्सरा किया जाता है उसका रिर्पोट का एक्सरा फिल्म भी मरीज को नही दिया जाता है। एक्सरे के बाद सिर्फ स्क्रीन का फोटो मोबाईल पर खिच कर दिया जाता है। वही किसी भी इमरजेंसी की स्थिति में मरीज को इंतजार करना या अन्य अस्पताल का रुख करना पड़ता है। ब्लड बैंक को ले कर भी कोई सुविधा व्यवस्था नहीं होने से मरीजों को खून की आवश्यकता होने पर परेशान होना पड़ता है। इमरजेंसी ओर आईसीयू वार्ड तो बने हुए है, लाखों की मशीन लगी हुई है लेकिन उनके संचालन के लिए कुशल स्टाफ तक नहीं है।
विवाद और वसूली बन चुकी है पहचान, सुधार के लिए कोई प्रयास नहीं
सिविल हॉस्पिटल पेटलावद में इलाज के लिए कम, विवाद ओर वसूली के लिए सबसे ज्यादा चर्चा में है। पूर्व बीएमओ सुरेश कटारा ओर पूर्व कलेक्टर नेहा मीणा का विवाद हो या, जमीन विवाद में उलझे डॉक्टर डाबी या बार-बार डिवेलरी ओर मरीज के इलाज के लिए नर्सों द्वारा पैसे मांगे जाने वाली रकम के वायरल वीडियो। या सिविल हॉस्पिटल में दवाइयां उपलब्ध होने के बाद भी हॉस्पिटल के बाहर निजी मेडिकल से दवाइयां उपलब्ध होने का मामला। गर्भवती महिलाओं को इलाज के लिए निजी हॉस्पिटलों में भेजने के मामले। इन सभी मामलों में सिविल हॉस्पिटल पेटलावद सबसे आगे है। ऐसे कई मामले उजागर हुए, प्रमाणित हुए लेकिन कार्रवाई नहीं।
हॉस्पिटल में पदस्थ डॉक्टरों के अवैध शराब की दुकानों पर किए गए हुड़दंग की खबरे भी आई। हॉस्पिटल में पदस्थ ज्यादातर डॉक्टर अपने निजी क्लीनिक ओर हॉस्पिटलों को संचालित करने में रुचि दिखा रहे है और हॉस्पिटल में नाम मात्र के लिए हाजरी लगाते है। इस प्रकार के गंभीर मामलों के सामने आने के बाद कार्रवाई के नाम पर कोई बड़ा एक्शन नहीं लिया गया, नतीजन आज तक हॉस्पिटल की व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ है।

