अब जरूरतमंद जनसुनवाई में घिस रहे चप्पले और लगा रहे गुहार
माही की गूंज, झाबुआ।
एक कहावत बड़ी मशहूर है कि ‘‘जब बाड़ ही खेत खाने लगे’’ तो खेत की रक्षा करना असंभव हो जाता है। यह मुहावरा इन दिनों नगरपालिका पर सटीक साबित होता नजर आ रहा है। झाबुआ नगरपालिका ने अतिक्रमण के नाम पर पहले अतिक्रमण हटाया। जरूरतमंद लोगों को बेरोजगार किया और बाद में खुद ही अतिक्रमण कर 52 गुमटियां रखकर उन्हे लाखों रुपए में बैच दिया। उस समय नगरपालिका के इस रवैये से आहत हुए लोगों ने अपनी जुबानी कुछ ऐसी हकीकत बताई थी कि, पूरा का पूरा सिस्टम सवालों के कटघरे में खड़ा हो गया था। नगरपालिका के कर्मचारियों ने गुमटी खरीददारों से 1 लाख 35 हजार रुपए की रकम यह कहकर वसूल ली थी की उपर से नीचे तक सबको बांटना पड़ता है, कलेक्टर तक को हिस्सा देना पड़ता है, मीडिया मैनेजमेंट करना पड़ता है। और 1 लाख 35 हजार के बदले खरीददारों को महज 35 हजार रुपए की रशीदें थमा दी गई थी। हालांकि माही की गूंज इस पर पूर्व में विस्तृत खबर प्रकाशित कर चुका है। लेकिन नगरपालिका द्वारा अतिक्रमण कर लगाई कई 52 गुमटियां एक बार फिर उस समय सुर्खियो में आ गई जब इस संबंध में जनसुनवाई में गुमटी लगाने को लेकर एक फरियादी ने आवेदन दे दिया।
जिला मुख्यालय पर हर मंगलवार होने वाली जनसुनवाई में एक 80 प्रतिशत दिव्यांग व्यक्ति ने गुमटी लगाने को लेकर आवेदन देते हुए गुहार लगाई। आवेदक ने खुले रूप से नगरपालिका पर आरोप लगाते हुए बताया कि ‘‘मैं गोविंद पिता शांतिलाल कलानी 80 प्रतिशत दिव्यांग हूं और टीचर्स कॉलोनी शनि मंदिर के पास झाबुआ का निवासी हूं। गोविंद ने अपने आवेदन में कलेक्टर को बताता है कि, करीब 8 माह पूर्व नगरपालिका द्वारा रोड बनाया जा रहा था। जिसके कारण मेरी लोहे की गुमटी जो शनि मंदिर के सामने लगी थी नगरपालिका द्वारा हटा दी गई। मुझे नगरपालिका ने आश्वासन दिया था कि मुझे वापस गुमटी लगाने दी जाएगी। जब मेरी दुकान लगाने की बारी आई तो पार्षद ने मुझे डेढ़ लाख रुपए देने की मांग रखी। मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहंी है कि मैं डेढ़ लाख दे सकू इसलिए मैं असमर्थ हो गया। गुमटी लगाने को लेकर मैं सीएमओ साहब को कई बार आवेदन दे चुका हूं, लेकिन मेरी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। परमीशन मांगने के बावजूद मुझे वहां गुमटी नहीं लगाने दी जा रही है। मैं करीब 8 माह से बेरोजगार होकर घर में बैठा हूं। जिन लोगों के पास पैसा था उन्होने गुमटियां खरीद ली है। अतः श्रीमान से निवेदन है कि, गुमटी लगवाने में सहयोग करें।’’
इसी तरह का एक और आवेदन एक और दिव्यांग ने जनसुनवाई में दिया है जिसे पहले अतिक्रमण के नाम पर हटाकर हॉकर जोन में जगह दी गई और अब वापस उसे वहां से हटने के लिए नगरपालिका के भ्रष्ट तंत्र ने नोटिस जारी कर दिया। जबकि यह आवेदक भी शारीरिक रूप से 85 प्रतिशत दिव्यांग है। नगरपालिका का यह रवैया तो अब साफ दिखाई दे रहा है कि, पहले अतिक्रमण हटाओ फिर खुद अतिक्रमण करो और लाखों कमाओ।
दिव्यांगो द्वारा जनसुनवाई में दिये गए यह आवेदन बहुत कुछ बयां कर रहा है। यह आवेदन माही की गूंज में पूर्व अंकों में छपी खबर की भी पुष्टी करता दिखाई दे रहा है। नगरपालिका द्वारा सिद्धेश्वर मार्ग पर लगाई गई 52 गुमटियों में बड़ा गोलमाल हुआ है। जिसको लेकर झाबुआ विधायक भी विधानसभा में प्रश्न उठा चुके है। भोपाल विधानसभा से नगरपालिका को नोटिस जारी कर जवाब भी तलब किया गया था। लेकिन नगरपालिका ने यह जवाब किसको और कैसे दिया यह अब भी यक्ष प्रश्न ही बना हुआ है।
हम पहले भी इस मुद्दे पर विस्तृत खबर प्रकाशित कर चुके है। अब फिर से इन अवैध 52 गुमटियों की चर्चा गर्माती दिखाई दे रही है। नगरपालिका ने खुद यहां अतिक्रमण कर 52 गुमटियां 1 लाख 35 हजार रुपए प्रति गुमटी के हिसाब से बैच दी है। जबकि विक्रेताओं को महज 35 हजार रुपए की ही रशीद थमाई गई है। इन 52 गुमटियों में पार्षद और पूर्व पार्षदों की भी एक से अधिक गुमटियां लगी हुई है जो कि उन्होने किराए पर दे रखी है। हालांकि इन गुमटियों के पहले भी यहां लोग रेड़ी लगाकर व्यापार व्यवसाय करते थे जिन्हे नगरपालिका ने अतिक्रमण मान कर हटा दिया था। तर्क यह था कि अतिक्रमण की वजह से मार्ग सकरा हो गया है और यातायात बाधित हो जाता है। मगर नगरपालिका ने खुद इस मार्ग पर अतिक्रमण हटाकर अतिक्रमण कर लिया और लाखों रुपए की हेरा-फेरी कर डाली। जबकि जिस तर्क के साथ अतिक्रमण हटाया गया था वह समस्या तो नगरपालिका के अतिक्रमण करने के बाद भी बनी हुई है। हालांकि नगरपालिका की अवैध गुमटियां बैचने के लिए कुछ नियम जरूर बनाए गए थे, लेकिन उन नियमों की अब सरे आम धज्जियां उड़ती दिखाई दे रही है। नाले पर लगी गुमटियां अब गुमटियों से बाहर निकलकर करीब 5 फीट तक सड़क पर आ गई है। और समस्या वही ढाक के तीन पात साबित हो रही है। सोने पर सुहागा यह है कि, जिस जगह यह 52 गुमटियां नगरपालिका द्वारा रखी गई है वह जमीन नहंी है नाला है। नगरपालिका द्वारा लगाई गई इन गुमटियां का विक्रेताओं को ना तो कोई पट्टा दिया गया है और ना ही कोई लीज मतलब सबकुछ गोलमाल ही गोलमाल...।
इसके उलट जिन जरूरतमंदों को गुमटी की आवश्यकता थी या जो यहां गुमटी लगाने के हकदार थे उनके पेट पर नगरपालिका ने सीधे तौर पर लात मार दी है। अब यह लोग न्याय और गुमटी लगाने को लेकर जनसुनवाई के चक्कर काट रहे है और गुहार लगाते फिर रहे है। मगर जनसुनवाई में भी इनके साथ धोखा ही हो रहा है। क्योंकि जब भी जनसुनवाई में आवेदन जाता वह सीधे नगरपालिका क्षेत्र का होने के कारण नगरपालिका सीएमओ के पास ही पहुंच जाता। स्थिति यह हो रही है कि, भ्रष्टों के हाथों में ही जांच पहुंच रही है। जिस नगरपालिका के सिस्टम से लड़ने के लिए आवेदक द्वारा आवेदन कलेक्टर को दिया गया था वह कलेक्टर ने उसी नगरपालिका के भ्रष्ट तंत्र को सौंप दिया जिनसे आवेदक कई बार गुहार लगा चुका है। इस बात का जिक्र भी आवेदक ने अपने आवेदन में किया है।
अब देखना यह है कि, नगरपालिका में बैठे भामाशाह और भ्रष्ट तंत्र जनसुनवाई के इन आवेदक को किस तरह रौंदते है। क्योंकि ‘‘वहां उम्मीद करना बेमानी होगी जहां ‘बाड़ ही खुद खेत को खाने लगे।
