बस स्टैण्ड से विजय स्तम्भ और थांदला गेट से आगे नहीं बढ़ती अतिक्रमण मुहिम
माही की गूंज, झाबुआ।
जिला मुख्यालय की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन बढ़ती आबादी के साथ जिला मुख्यालय की नगरपालिका की व्यवस्थाएं ना काफी साबित हो रही है। जिला मुख्यालय पर मुख्य बाजार दिन ब दिन सकड़ा होता जा रहा है, तो शहर में दो पहियां व चार पहियां वाहनों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। लेकिन ना तो जिला मुख्यालय की नगरपालिका के पास ढंग की वाहन पार्किंग है और ना ही अस्थाई अतिक्रमण को हटाने की कोई पुख्ता कार्य योजना। जब भी दबाव पड़ता है नगरपालिका का अतिक्रमण हटाने वाला अमला माथा उतारनी करने के लिए गिनी-चुनी जगह कार्रवाई करने पहुंच जाता है। नतीजा कुछ ही दिनों में स्थिति ढाक के तीन पात साबित हो जाती है।
वैसे तो जिला मुख्यालय के चारों ओर अतिक्रमण की बाढ़ आई हुई है। मेघनगर नाका, राजगढ़ नाका, मौजीपाड़ा यह शहर के ऐसे स्पार्ट है जहां अतिक्रमणकारी दिन दुनी और रात चैगुनी रफ्तार से अतिक्रमण कर रहे है। जिला मुख्यालय का मुख्य बाजार भी इससे अछूता नहीं है। बाजार में लगने वाली स्थाई दुकानें अपनी हद से बाहर आकर सड़क पर करीब 3 से 5 फिट तक नजर आती है। क्षेत्र में ग्रीष्मकाल का यह सीजन आदिवासी समाज में शादी-ब्याह का सीजन माना जाता है और इस दौरान जिला मुख्यालय के बाजार में जमकर भीड़ देखी जाती है। यही वह समय भी है जो नगरपालिका की पोल खोलकर रख देता है। होली और शीतला सप्तमी से शुरू होने वाली यह शादी-ब्याह की सीजन बारिश के पहले तक चलती है। जिला मुख्यालय पर बाजारों में खरीदी करने के लिए भीड़ भी इसी समय में उमड़ती है, लेकिन जिला मुख्यालय पर व्यवस्थाओं के नाम पर ना तो कोई स्थाई पार्किंग व्यवस्था है और ना ही बाजार की व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोई कार्य योजना। नतीजा यह होता है कि, इन दिनों पूरे जिला मुख्यालय के बाजारों की स्थिति गंभीर और अव्यवस्थाओं से भरी पड़ी मिलती है।
ऐसी स्थिति में जब-जब नगरपालिका पर दबाव शिकायतों का दबाव या आला अधिकारियों का दबाव पड़ता है तो फिर नगरपालिका का अतिक्रमण हटाओ दस्ता माथा उतारनी करने के लिए नगर में निकलता है। नगरपालिका की अतिक्रमण हटाओ टीम इस काम की शुरूआत हर बार बस स्टैण्ड से ही करती है। यहां लगने वाले छोटे फल विक्रेताओं के ठेले हर बार इनका निशाना बनते है। नगरपालिका ही यह अतिक्रमण हटाओ मुहिम हर बार उन्ही स्थानों पर जाती है जहां वह हमेशा ही अतिक्रमण हटाने पहुंचती है। बस स्टैंड से लेकर विजय स्तम्भ तक अतिक्रमण मुहिम चलाई जाती है। इसमें अतिक्रमण नाम मात्र का ही हटाया जाता है। अधिकांश लोगों को सिर्फ अतिक्रमण हटाने की समझाईश भर ही दी जाती है। मगर नगरपालिका की इस अतिक्रमण मुहिम पर हर बार सवालिया निशान ही खड़े होते नजर आते है।
पिछले दिनों फिर एक बार नगरपालिका से अतिक्रमण मुहिम के नाम पर एक जिन्न निकला और गरीबों के ठेलों पर कार्रवाई करते हुए उनकी रोजी-रोटी पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया। जबकि शहर के मुख्य बाजार में अतिक्रमण की स्थिति बहुत ज्यादा दयनीय और बद से बदत्तर होती दिखाई देती है। मुख्य बाजार सहित रूनवाल बाजार, सुभाष मार्ग, टॉकिज गली में भी हाल, बेहाल है। नगरपालिका का अमला इस ओर कभी निकलने की हिमाकत नहीं करता। कारण यह है कि, यहां सारे व्यापारी समृद्ध और आर्थिक स्थिति से मजबूत तथा नगरपालिका में बैठे भामाशाहों के संबंधों व संपर्क वाले है।
बस स्टैंड और आसपास में अपनी दुकानें लगाने वाले गरीब फल विक्रेताओं का कहना है कि, नगरपालिका हमेशा इसी क्षेत्र में अतिक्रमण मुहिम चलाकर इतिश्री कर लेती है और हम गरीबों का नुकसान करती है। इसके अलावा वे कभी बड़े व्यापारियों और बड़े अतिक्रमणकर्ताओं की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखती। हर बार नगरपालिका का अमला हम छोटे व्यापारियों को ही निशाना बनाता है, लेकिन आजतक नगरपालिका ने इस समस्या का कोई ठोंस समाधान नहीं निकाला है। अगर नगरपालिका हमें कोई अच्छी जगह दुकान लगाने के लिए दे, दे तो फिर हम इस तरह रास्तों पर अतिक्रमण ही क्यों करेंगे...?
एक फल विक्रेता के अनुसार नगरपालिका की यह अतिक्रमण कार्यवाही भेदभाव पूर्ण होती है। जहां एक तरफ शहर के मुख्य बाजार में व्यापारियों ने पक्के व स्थाई अतिक्रमण कर रखे है, वहां नगरपालिका के जिम्मेदार अतिक्रमण हटाने की जुर्ररत तक नहीं करते। वहीं दूसरी ओर हम जैसे गरीब लोगों पर ज्यादती करते हुए अतिक्रमण हटाया जाता है और हमारा नुकसान भी किया जाता है। हम गरीब लोग बाजार में ठेला लगाकर अपनी जीवीका चलाते है। जब-जब नगरपालिका, अतिक्रमण के नाम पर हम पर कार्रवाई करती है तब-तब लगभग सप्ताह भर हमारी दाल-रोटी के लाले पड़ जाते है। शहर में और भी जगह अतिक्रमण पसरा पड़ा है लेकिन नगरपालिका सिर्फ हमें ही टारगेट कर हमारा नुकसान करती है।
एक ठेला व्यापारी ने बताया कि, विडम्बना यह है की हमारे ठेले को नगरपालिका अतिक्रमण कहकर हटा रही है। वह उसी ठेले के हर रोज बैठक पर्ची के नाम पर 20 रुपए तक वसूलती है। नगरपालिका को चाहिए कि, यदि वह हमें अतिक्रमण मानती है तो फिर बैठक शुल्क भी लेना बंद कर दे। और यदि बैठक शुल्क लेती है तो फिर हमें इस समस्या का स्थाई समाधान तलाश कर दें। ताकि आए दिन नगरपालिका की इस अतिक्रमण मुहिम का हमें शिकार ना होना पड़े।
फल विक्रेताओं के अनुसार एक तरफ तो नगरपालिका हमारे फल-फ्रुट के ठेले को अतिक्रमण बता रही है लेकिन वहीं दूसरी ओर सिद्धेश्वर मंदिर रोड पर खुद नगरपालिका ने अतिक्रमण कर गुमटियां लगाकर अवैध तरीके से बैच दी है। जबकि पहले यहां भी अतिक्रमण के नाम पर गरीब व्यापारियों को परेशान किया जाता रहा है। अब जहां नगरपालिका ने गुमटियां लगाकर बैची है, वह गुमटी मालिक भी नियम कायदों को ताक में रखकर करीब 5-5 फीट रोड़ पर अपनी दुकानें सजा रहे है। इसको लेकर कभी नगरपालिका ने कोई मुहिम नहीं छेड़ी। वो कहते है ना कि, अपनी मां को डाकन कौन कहे...!
लोग सोशल मीडिया पर भी नगरपालिका की इस तरह की अतिक्रमण कार्रवाई पर सवाल खड़े कर रहे है। लोगों का कहना है कि, आखिर क्या वजह है की नगरपालिका की अतिक्रमण मुहिम बस स्टैण्ड से लेकर विजय स्तम्भ और इधर थांदला गेट से आगे क्यों नहीं बढ़ती...? पिछले कुछ वर्षों में यह देखने में भी आया है कि, नगरपालिका अपनी अतिक्रमण मुहिम केवल इसी क्षेत्र में चला रही है। जबकि अतिक्रमण का काला साया तो पूरे जिला मुख्यालय पर है। ऐसी स्थिति में लोगों का सवाल करना तो जायज ही है। नगरपालिका को अगर निष्पक्षता दिखानी है तो फिर उसे शहर में पसरे पड़े अन्य क्षेत्रों के अतिक्रमण को भी देखना और हटाना ही होगा, खासकर नगर के मुख्य बाजार से। यहां एक बात है की सिर्फ अतिक्रमण हटाने भर से व्यवस्थाएं सुचारू नहंी होंगी इसके लिए सही कार्य योजना का होना बहुत जरूरी है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में वाहन पार्किंग की स्थाई व्यवस्था करनी होगी। छोटे ठेला व्यापारियों को व्यवस्थित स्थान पर जगह देनी होगी। नियम तोड़ने वालों पर कड़ी कार्रवाई भी जरूरी है। सबसे बड़ी बात नगरपालिका को भेदभावपूर्ण रवैये को छोड़ना होगा, यदि ऐसा नहंी होता है तो फिर नगरपालिका पर उठने वाले सवालों को सही माना जाएगा।
