नियम तो यह कि हर कर्मचारी को अपने पदस्थापना मुख्यालय पर रहना है, लेकिन हकीकत में स्थिति ढाक के तीन पात
माही की गूंज, झाबुआ।
इन दिनों कलेक्टर के एक आदेश ने जिले के पटवारियों में हलचल मचा कर रख दी है। कलेक्टर कार्यालय से जारी आदेश के अनुसार अब पटवारियों को हर सप्ताह दो दिन सोमवार और गुरूवार को अपनी संबंधित ग्राम पंचायत मुख्यालय पर अनिवार्य रूप से उपस्थित रहना होगा। आदेश में विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि, प्रत्येक पटवारी जनसुनवाई के दिन और सप्ताह में एक दिन गुरूवार को अनिवार्य रूप् से ग्रामीण क्षेत्र में ही रात्रि विश्राम करेगा। इस दौरान पटवारियों को उनके द्वारा किए गए कार्यों का पूरा विवरण एक रजिस्टर में संधारित करना होगा। जिसका निरीक्षण और प्रमाणीकरण संबंधित एसडीएम, तहसीलदार या नायब तहसीलदार करेंगे। कलेक्टर ने सभी एसडीएम और तहसीलदार को निर्देशित किया है कि, वे पटवारियों की उपस्थिति और कार्यों की नियमित रूप से समीक्षा करें।
कलेक्टर कार्यालय से जारी उक्त आदेश से जिले के 315 पटवारियों में हलचल सी मच गई है। वैसे तो यह आदेश किसी भी पटवारी को हजम नहीं हो रहा है। लेकिन दबी जुबान से सभी पटवारी महिला पटवारियों के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे है। क्योंकि जिले में 315 में से लगभग 78 महिला पटवारी कार्यरत है। पटवारी संघ की ओर से जारी वक्तव्यों के अनुसार प्रशासन को जिले की व्यावहारिक और भौगोलिक स्थिति को भी समझना होगा। हमारी मांग है कि, प्रशासन इस व्यावहारिक संकट को समझे और इस आदेश में संशोधन करते हुए महिला पटवारियों को रात्रि विश्राम की अनिवार्यता में छूट प्रदान करे।
इस आदेश के बाद पटवारियों ने महिला पटवारियों का पक्ष लेते हुए कई सारी समस्याओं का बखान किया है। जैसे अकेली महीला पटवारी किस तरह ग्राम पंचायत मुख्यालय पर रात्री में विश्राम कर सकती है। जबकि ग्रामीण अंचल में बिजली को लेकर काफी समस्या बनी रहती है। कई पंचायत भवनों में शौचालय का भी अभाव है तो भौगोलिक स्तर पर कई तरह की समस्याएं महिला पटवारियों को हो सकती है। इसके अलावा ग्राम पंचायतों में सुरक्षा के इंतेजाम भी न के बराबर होते है। ऐसी स्थिति में महिला पटवारियों का ग्राम पंचायतों में रात्रि विश्राम कई चुनौतियां खड़ी कर सकता है। खैर कलेक्ट्रोरेट से यह आदेश जारी तो हो गया है लेकिन अब देखना यह है कि, क्या महिला पटवारियों के पक्ष में इसमें कुछ संशोधन हो पाएगा।
हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जबकि किसी कलेक्टर ने इस तरह के आदेश जारी किए हो। नियम के अनुसार मध्यप्रदेश के सभी शासकीय कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से अपने पदस्थापना के मुख्यालय पर ही रहना होता है। हालांकि इसके परिपालन की स्थिति जिले में बड़ी ही गंभीर है। क्योंकि जिले में 90 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी ऐसे है जो अपनी पदस्थापना मुख्यालय पर नहीं रहते है। इनमें सबसे बड़ी संख्या शायद शिक्षकों की है। वैसे तो ग्रामीण क्षेत्र में तैनात हर कर्मचारी करीबी किसी बड़े कस्बे या शहर में ही निवास करते है। तो कुछ कर्मचारी ऐसे भी है जो जिले में नहीं रहते बल्कि करीबी जिलों से डेली अप-डाउन करते हैं। इस स्थिति को प्रमाणित करने की भी आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि जिले से होकर चलने वाली सवारी बसों और ट्रेनों में ऐसे कर्मचारियों की भीड़ रोज ही सफर करती है।
इससे पहले भी कई कलेक्टरों ने इस तरह के आदेश सख्ती से जारी किए है कि, कर्मचारियों को अपनी पदस्थाना मुख्यालय पर ही रहना है। लेकिन अधिकारियों के तबादले के बाद स्थिति ढाक के तीन पात हो जाती है। पटवारियों पर जारी किया गया कलेक्टर का यह निर्देश सही है पर कितने दिन और कैसा काम करता है यह तो समय के गर्भ में है। लेकिन जिले का इतिहास यह भी बताता है कि, ऐसे आदेशों -निर्देशों की स्थिति जल्द ही ढाक के तीन पात हो जाती है।
जिले का इतिहास उठाकर अगर देखें तो यहां यूं तो कई कलेक्टरों ने ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर रात्रि विश्राम किया है। कई मंत्री भी जिले के ग्रामीण अंचलों में रात्रि विश्राम कर चुके है। हालांकि इस तरह के घटनाक्रम को घटे जिले में शायद दशक भर से ज्यादा हो गया। तो क्या अब कलेक्टर फिर से इस राह पर चलकर खुद भी ग्रामीण क्षेत्रों में रात्रि विश्राम करेंगे...?
रही बात नियम की तो नियम कहते है कि मध्यप्रदेश के शासकीय कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से अपने पदस्थापना के मुख्यालय पर ही रहना होता है। ऐसा न करने पर उनके खिलाफ मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत विभागीय कार्रवाई और निलंबन तक हो सकता है। सभी विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों को शासकीय कार्यों के प्रति तत्परता और आपातकालीन स्थितियों में उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अपने कार्यक्षेत्र के मुख्यालय में ही रात्रि निवास करना अनिवार्य है। यदि मुख्यालय पर आवास की समस्या हो, तो वरिष्ठ अधिकारियों (कलेक्टर, विभागाध्यक्ष) की विशेष अनुमति से कर्मचारी अपने मुख्यालय के 8 किलोमीटर के दायरे में निवास कर सकते है।
मुख्यालय में न रहने पर ‘गृह भाड़ा भत्ता’ की पात्रता प्रभावित होती है और यदि कर्मचारी मुख्यालय में रहने का फर्जी पता देकर भत्ते का लाभ लेते हैं, तो यह धोखाधड़ी मानी जाती है। बिना लिखित अनुमति के मुख्यालय छोड़ने या मुख्यालय पर अनुपस्थित पाए जाने पर मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के अंतर्गत कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। चुनाव आचार संहिता या आपातकालीन परिस्थितियों में जिला प्रशासन द्वारा सभी कर्मचारियों के मुख्यालय छोड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाता है। यदि किसी कर्मचारी को अपरिहार्य कारणों से मुख्यालय से बाहर जाना हो, तो उन्हें अपने उच्च अधिकारी से पूर्व स्वीकृति (लिखित अवकाश या अनुमति) प्राप्त करना अनिवार्य है। सामान्य प्रशासन विभाग या संबंधित विभाग के स्थापना शाखा के दिशा-निर्देशों में इसका स्पष्ट उल्लेख होता है।
इस तरह के नियम निर्देशों के पालन करवाने की जिले में अति आवश्यकता दिखाई पड़ रही है। तो पटवारियों के साथ-साथ कलेक्टर को चाहिए कि वे तमाम शासकीय कर्मचारियों को नियम अनुसार चलने पर बाध्य करें। ताकि जिस तरह पटवारियों के ग्राम पंचायत मुख्यालय पर रूकने से ग्रामीणों व आम जनता का भला व काम हो सकेंगे, उसी तरह सभी शासकीय कर्मचारियों के पदस्थापना मुख्यालय पर रहने से कई तरह के फायदे जिले की आमजनता को होंगे।
