जमीनी स्तर पर नगर में सफाई व्यवस्था राम भरोसे, बदबूदार व कचरे से पटे तालाबों की स्थिति बता रही असल कहानी
माही की गूंज, झाबुआ।
झाबुआ जिला मुख्यालय की हमेशा कर्जे में डूबी रहने वाली नगरपालिका इस बार स्वच्छता सर्वेक्षण में अच्छी रेंक के लिए दीवारों पर पेंटिग से पार पाना चाहती है। जबकि नगर की सफाई व्यवस्था और गंदे तालाब उसे मुंह चिढ़ाकर पार ना हो पाने की चुनौतियां देते दिखाई दे रहे है। मगर कहते है ना कि, पेंट कोई सा भी लगाओ दीवारें कभी बोलती नहीं है, मगर हां दीवारों के कान जरूर होते है। जिस तरह नगरपालिका, शहर में जगह-जगह खाली पड़ी दीवारों को रंगने में पैसा खर्च कर रही है अगर वही पैसा सफाई व्यवस्था या तालाबों की सफाई में खर्च करती तो शायद परिणाम कुछ ओर होते। मगर नगरपालिका में बैठे जिम्मेदारों और भामाशाहों को लगता है कि, दीवारों को पोत देने से दीवारें बोल उठेंगी। दीवारें बोले या ना बोले मगर नगर में सढ़ांध मारते तालाब बहुत कुछ कह रहे है। नगर का छोटा तालाब जो करोड़ों के भ्रष्टाचार के बावजूद भी अपनी दुदर्शा पर आंसू बहा रहा है। वह अब भी गंदे नाले में दिन ब दिन तब्दील होता जा रहा है। शहर के दुषित होते इन तालाबों पर नगरपालिका सिर्फ फव्वारें लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री में लगी हुई है। भला यह क्या लॉजिक हुआ कि, गंदे पानी में फव्वारा लगाने से पानी साफ हो सकता है...? जो फव्वारे गंदे तालाबों में नगरपालिका ने पानी में ऑक्सीजन लेवल बढ़ाने और पानी को साफ करने के लिए लगाए थे वे महज कुछ ही दिन अपना झांकी मंडप दिखा पाए। विडम्बना यह कि कई बीघा लंबे-चैड़े तालाबों में महज एक-एक फव्वारा ही लगाया गया। यह कैसे संभव है कि इतने बड़े तालाब में एक फव्वारा पानी के ऑक्सीजल लेवल को बढ़ा देगा या पानी को साफ कर देगा...? हालांकि इन फव्वारों में लगी लाइटिंग जरूर लोगों को आकर्षित कर रही थी। मगर महज कुछ दिनों में इन फव्वारों की हवा निकल गई और अब यह फव्वारे कभी बंद तो कभी चालू तो कभी फव्वारे की लाइट बंद तो कभी चालू वाली स्थिति बनी हुई है।
लोग कहते है कि, यह नगरपालिका के माथा उतारनी के चैचले है। छोटे तालाब में लगा फव्वारा तो महज एक या दो दिन चल पाया। उसके बाद से ही इस तालाब में लगे फव्वारे बंद पड़े है। तालाब पूरी तरह से सेप्टिक टेंक में तब्दील हो चुका है और इससे भयानक बदबू आती है जो रहवासियों और राहगीरों का जीना दुर्भर कर रही है। तालाब के आसपास भरपूर अतिक्रमण फैल चुका है जिसे हटाने में नगरपालिका हमेशा ही नाकाम साबित हुई है। इस तालाब के सौंदर्यीकरण में गढ़ी गई भ्रष्टाचार की गाथा पूरे शहरवासियों को मालूम है। जिसमें कलेक्टर जैसे अधिकारियों तक के नाम जांच में उजागर हुए है। ऐसी स्थिति में नगरपालिका इन तालाबों में फालतू के फव्वारें लगाकर क्या साबित करना चाहती है। हालांकि बताने वाले बताते है कि, कलेक्टर साहब आए थे निरीक्षण करने और वे ही तालाब के आसपास का अतिक्रमण हटाने व तालाब में फव्वारे लगाने के निर्देश दे गए थे। तो नगरपालिका ने भी आव देखा ना ताव बिना किसी मतलब के ही तालाबों में एक-एक फव्वारे डाल दिए।
पिछले दिनों स्वच्छता सर्वेक्षण 2026 की टीम झाबुआ दौरे पर आई थी। नगरपालिका ने उन्हे सावन का अंधा समझ कर सबकुछ हरा-हरा दिखाने की कोशिश भी की थी, लेकिन स्वच्छता सर्वेक्षण की केंद्रीय टीम नगर में भ्रमण के दौरान छोटे तालाब पर पहुंच गई और नगरपालिका की सारी पोल खुल गई। हालांकि नगरपालिका ने नगर की रंगी पुती दीवारे दिखाकर टीम को प्रभावित करने के भरसक प्रयास किए थे लेकिन नगर के गंदे, बदबूदार और अतिक्रमणयुक्त तालाबों ने नगरपालिका के मुंह पर कालिख पोतकर रख दी। टीम ने स्थिति को देखकर काफी असंतुष्टी जाहिर की। स्वच्छता सर्वेक्षण की टीम जो अपना काम कर चुकी, लेकिन नगरपालिका अब सांप निकल जाने के बाद लाठी पीटती नजर आ रही है। कलेक्टर के निर्देश के बाद नगरपालिका प्रशासन एक्शन मोड में आने का दिखावा कर रहा है। तालाब के आसपास अतिक्रणकर्ताओं पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।
अब सवाल यह है कि, स्वच्छता सर्वेक्षण में नगरपालिका जिस वाल पेंटिग के जरिए पार पाना चाहती थी वह अब कितना काम आएगी...? और नगरपालिका के स्वच्छता सर्वेक्षण का भांडा फोड़ने वाले तालाबों का क्या होगा...? या फिर यही गंदे, बदबूदार तालाब झाबुआ नगरपालिका को स्वच्छता सर्वेक्षण की रैंकिग लिस्ट से बाहर कर देंगे...? या फिर नगरपालिका में बैठे जिम्मेदार और भामाशाह कोई गोटी ऐसी फैकेंगे कि नगरपालिका स्वच्छता सर्वेक्षण की रैंक में अग्रणी बन जाए...?
खैर जो भी हो लेकिन रंगी पुती दीवारे कभी बोलती नहीं है, और कई बीघा में फैले तालाब में एक-एक फव्वारे लगाकर ऑक्सीजन लेवल बढ़ाना और पानी साफ करना सूरज को दिया दिखाने जैसा ही लगता है।
