माही की गूंज, झाबुआ।
वैसे तो जिला हमेशा से ही अधिकारियों की फोटो छपाउ प्रवृत्ति से आहत रहा है, लेकिन हर बार जब अधिकारियों के तबादले होते है तो एक नई उम्मीद जिले की जनता में जागृत हो जाती है कि, शायद अब तो फटे पोस्टर से हीरो निकलेगा। मगर जब पोस्टर फटता है और हीरो की जगह सिर्फ फोटो छपाउ अधिकारी जिले मे ंआ जाते है तो जिले की जनता बे उम्मीद होती दिखाई देती है। जिले में आए ऐसे कई आईएएस अधिकारियों की फहरिस्त मौजूद है जो जिलेवासियों की उम्मीदों पर खरा ना उतरकर सिर्फ और सिर्फ खबर छपाउ और फोटो खिलाउ ही साबित हुए है। कईयों ने तो हमाम में सब नंगे की तर्ज पर जिले में खूब भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकियां लगाई है। मगर कुछ अधिकारी जिले को ऐसे भी मिले है जिन्होने अपने सिमित कार्यकाल में हीरो का रोल अदा किया है। हालांकि ऐसे अधिकारियों की फहरिस्त बहुत छोटी है। क्योंकि जिले की राजनीति पार्टियों को कभी अच्छा काम करने वाले अधिकारी पसंद ही नहीं आए और येन-केन प्रकारेण उन्हे यहां से रवानगी दिलवा दी गई। तो कई अधिकारी जिले में आकर ऐसे राजनीतिक रंग में रंगे कि तुम भी खाओ हम भी खाएं, तुम भी खुश रहो हम भी खुश रहे की कहानी गढ़ कर चले गए।
अभी कुछ दिनों पहले ही जिले की कमान लंबे समय के बाद किसी पुरूष अधिकारी के हाथ में आई है। इससे पहले जिले में एक लंबे कार्यकाल तक महिला अधिकारियों की ही चर्चा रही है। जिसमें महज एकाध महिला कलेक्टर ही ऐसी रही जिनकी कार्यप्रणाली जिले वासियों को समझ में आई लेकिन वे भी जिले की राजनीतिक पार्टियों के सामने बली का बकरा बनी और जिले से रवाना हो गई। इसके अलावा जिले में आई महिला अधिकारियों में कुछके नाम ही सम्मान से लिए जाते है। मगर पिछले कार्यकाल में जिला अधिकारी के रूप में पदस्थ हुई कलेक्टर नेहा मीणा पूरे कार्यकाल में मीठा-मीठा गट और कड़वा-कड़वा थू ही करती दिखाई दी। लंबे समय के बाद जिले को मिले पुरूष आईएएस अधिकारी ने जिले वासियों की उम्मीदों को जरा ज्यादा ही जगा दिया। शुरूआती दौर में सबकुछ ठीक ही दिखाई दे रहा था लेकिन बाद में स्थिति यह हो गई कि ‘नया मुल्ला जरा जोर से ही अजान देता है’’। वर्तमान स्थिति को देखते हुए जिले की जनता की उम्मीदें भी धुमिल होती ही नजर आ रही है।
कलेक्टर के रूप में जिले में पदस्थ हुए योगेश तुकाराम भरसट की जब जिले में पदस्थापना हुई तो जिलेवासियों को कई उम्मीदें बंध गई कि, चलो जिले में महिलाओं के बाद अब कोई पुरूष अधिकारी जिले को मिला है ऐसे में जिले के विकास में भी तेजी आएगी। लेकिन जिलेवासियों की यह उम्मीद अब धीरे-धीरे धुमिल होती दिखाई दे रही है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है कि, पिछले कुछ दिनों में जिले में कुछ मामले ऐसे आए है जिन्हे देखकर कलेक्टर की कार्यप्रणाली प्रभावी नहीं दिखाई दे रही है। बल्कि अधिनस्त अधिकारी, कलेक्टर को सबकुछ हरा-हरा ही दिखाने में लगे हुए है। जब से कलेक्टर जिले में आए है ब्लॉक वार जनसुनवाईयों का आयोजन हो रहा है। इन्ही जनसुनवाईयों में कई मामले ऐसे आ रहे है जो जिले की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे है। कभी जनसुनवाई में ऐसा मामला आ जाता है कि, मृत्यु के बाद लोगों को मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिल रहा है, तो कभी इसी तरह की जनसुनवाई में मुर्दे आवेदन लेकर पहुंच रहे है। मंगलवार को थांदला ब्लॉक में हुई जनसुनवाई में एक ऐसा ही विकलांग दंपत्ती पहुंच गए जो जिला प्रशासन के रिकार्ड में मृत घोषित हो चुके है। यानि कलेक्टर के सामने मुर्दा दंपत्ति ने यह गुहार लगाई है कि, साहब हम जिंदा है। यह ऐसे मामले है जो जिले की प्रशासनिक व्यवस्था को ध्वस्त साबित करने के लिए काफी है। इस तरह के मामलों में कलेक्टर का रिएक्शन इतना प्रभावी नहीं दिखाई दिया जैसा कि होना था। ब्लॉक स्तर पर जनसुनवाई कोई नया आयोजन भी नहीं है। पिछली फोटो और खबर छपाउ कलेक्टर भी अपने फोटो छपवाने के लिए इस तरह के आयोजन कर चुकी है। मगर यह आयोजन महज दिखावटी ही साबित हुआ था। न तो ब्लॉक स्तर पर जन की सुनवाई हो सकी ना ही उनकी समस्या का समाधान। हुआ तो बस यह कि अगले दिन अखबारों में मेडम की फोटो और खबरें ऐसी छपी मानों बस जिले की समस्या समाप्त ही हुई समझो...? मगर कहते है ना हाथी के दांत खाने के ओर दिखाने के ओर। अब जिले में आए नए कलेक्टर भी इसी तर्ज पर चल रहे है। अपने हर दौरे और निरीक्षण को प्रसारित और प्रचारित करने के भरसक प्रयास खुले तौर पर दिखाई दे रहे है।
पिछले दिनों राणापुर निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने राणापुर नगर के तालाबों और बस स्टेंड का निरीक्षण किया। तालाबों की सफाई के निर्देश दिए तो वहीं बस स्टेंड पर व्याप्त अव्यवस्थाओं को दुरूस्थ करने के भी निर्देश दिए यह अच्छी बात है। मगर कलेक्टर साहब को जिला मुख्यालय के गटर बन चुके तालाब अब तक दिखाई नहीं दे रहे है। इन्हे लेकर उन्होने अब तक ना तो नगरपालिका को निर्देशित किया है और ना ही किसी अन्य विभाग या अधिकारी को। निरीक्षण के दौरान वे आरटीओ बनते भी नजर आए। बसों में चढ़े यात्रियों से बात की और बसों में किराया सूची का निरीक्षण किया। जबकि यह काम उनका नहीं था वे चाहते तो उसी समय आरटीओ को निरीक्षण कर कार्रवाई के निर्देश दे सकते थे लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं और अगले दिन अखबारों की सुर्खियां थी ‘रील नहीं रियल लाइफ के नायक’। जबकि कलेक्टर के इस निरीक्षण के बाद भी स्थितियां ढाक के तीन पात ही है। अब भी जिला मुख्यालय व आसपास के क्षेत्रों से चलने वाली अधिकांश बसें या तो कंडम स्थिति में है या फिर अवैध परमीट पर दौड़ रही है। बसों में ना तो फायर सेफ्टि का कोई पता है ना ही फास्टेड बॉक्स। बावजूद इसके आरटीओ की इन बसों को खुली छूट कई सवाल खड़े कर रही है। इसी वजह से कलेक्टर का यह निरीक्षण भी सवालों के घेरे में खड़ा होता दिखाई दे रहा है। क्या इस निरीक्षण का मकसद सिर्फ फोटो खिंचावना और छपवाना ही था या फिर असल में कलेक्टर को जिले में सफर कर रहे यात्रियों की चिंता थी...? अगर ऐसा है तो फिर कलेक्टर के इस निरीक्षण के दौरान जिले की आरटीओ कहां थी, क्या कलेक्टर ने उन्हे फोन पर निर्देशित किया...?
सवाल तो यह है कि, क्या बसें सिर्फ इन्ही कलेक्टर के कार्यकाल में चल रही है? इससे पहले भी तो बसें जिले में संचालित हो रही थी, मगर आरटीओ मेडम तभी जागती है जब प्रदेश में कोई हादसा बसों को लेकर सामने आता है वह भी महज कुछ ही समय के लिए। बाद में स्थिति ज्यौ की त्यो ही बनकर रह जाती है। आए दिन अखबारों में जिले में संचालित होने वाली बसों को लेकर खबरें छपती है लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं होता। महज अखबारों को गोल-मोल वक्तव्य दे दिए जाते है।
कुल मिलाकर बात यह है कि, कलेक्टर के निरीक्षण करते फिरने से जिले का कुछ होने वाला नहीं है। कुछ करना है अगर तो फिर अपने अधिनस्तों की नकेल कसना होगी। अधिकारियों को मजबूर करना होगा कि वे अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाए। अगर ऐसा नहंी हुआ तो कलेक्टर को ही आरटीओ बनकर घूमते रहना पड़ेगा। और अगर यह कलेक्टर की सिर्फ फोटो खिंचाओ मुहिम है तो फिर जिले की आमजनता को बधाई कि जिले में एक बार फिर फोटो खिंचाउ और फोटो छपाउ प्रशासन और मुखिया मिला है। लेकिन जिला अभी भी उम्मीदो के सहारे टिका है, देखना है कलेक्टर श्री भरसट किस किनारे जा कर बैठते है।
