माही की गूंज, झाबुआ डेस्क।
बाबा साहेब डॉक्टर अंबेडकर द्वारा लिखित भारतीय संविधान में सुचारू शासन संचालित करने के लिए पक्ष और उनके किसी भी कार्य का लोकतांत्रिक विरोध करने के लिए विपक्ष बनाया है। पिछले दिनों संसद के विशेष सत्र में सरकार ने तीन महत्वपूर्ण विधेयक संसद में पेश किए गए लेकिन सरकार उन्हें दो तिहाई बहुमत के साथ पारित नहीं करवा पाई। इसके बाद पक्ष और विपक्ष दोनों ही दलों द्वारा परस्पर दोषारोपण किया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि, वह महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है लेकिन सरकार की मंशा महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन विधेयक पारित करवाना था। जिससे लोकसभा क्षेत्रो का नया परिसीमन करवा कर, लोकसभा और राज्यों की विधानसभा सदस्य संख्या बढ़ाना चाहते हैं। अगर सरकार वास्तव में महिलाओं की इतनी चिंता करती है तो उसे मौजूदा सदस्य संख्या में से ही 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए। जबकि सरकार को चाहिए था कि, वह इस बिल को पेश करने के पहले ही तमाम राजनीतिक दलों से चर्चा कर, उनकी शंका का समाधान करते हुए एक सर्वसम्मान बिल पेश करना था जिससे विपक्ष भी उस बिल का समर्थन करता। लेकिन जैसा की विपक्ष का आरोप है कि, पांच राज्यों के चुनाव के बीच में सरकार द्वारा विशेष सत्र बुलाया जाना और बिल पेश करना एक जल्दबाजी में उठाया गया कदम था। जो की चुनावी राज्यों में लाभ लेने की दृष्टि से लाया गया था। लेकिन विपक्ष ने सरकार की मंशा को पूरा नहीं होने दिया।
जिसके बाद देशभर में सरकार ने बिल के समर्थन में प्रदर्शन का ऐलान किया। वही विपक्षी दल भी सरकार द्वारा लाए गए बिल की हकीकत को जनता के सामने रख रहे हैं।
विपक्ष को विरोध करने का संवैधानिक हक है ऐसे में सरकार द्वारा यह कहना कि, विपक्ष के विरोध के कारण नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित नहीं हो पाया, सही नहीं है। विपक्षी दलों के सांसद भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही है ऐसे में उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। और सरकार की नीतियों की तथ्यात्मक और संवैधानिक आलोचना करना उनका अधिकार है। सरकार किसी भी नीतिगत निर्णय को पारित करने के पहले विपक्ष को विश्वास में लेना आवश्यक है। यही तो हमारे संविधान की मुख्य विशेषता है कि, इसमें सरकार के साथ ही विपक्ष को अहमियत मिली हुई है।

राष्ट्र के नाम संबोधन पर भी विवाद
नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित न होने पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए राष्ट्र के नाम संबोधन को लेकर भी विवाद छिड़ गया है। कई बुद्धिजीवी इसे सरकारी पद का दुरुपयोग मान रहे हैं। उनका कहना है कि, सरकार द्वारा किसी विधेयक को संसद में पास करना या ना करना संसद का कार्य है और संसद के सदस्यों ने उसे संवैधानिक तरीके से ही पास नहीं होने दिया है, इसमें गलत क्या है...? ऐसे में प्रधानमंत्री का बीच चुनाव में राष्ट्र के नाम संबोधन केवल चुनावी लाभ के लिए किया गया राजनीतिक स्टंट था। ऐसे में कल को अगर सरकार द्वारा लाया गया अन्य कोई विधेयक पारित नहीं होता है तो, क्या हर विधेयक पर प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधन करेंगे और माफी मांगेगंे...? राष्ट्र के नाम संबोधन विशिष्ट परिस्थितियों में ही किया जाता है और राष्ट्र के नाम संबोधन राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय महत्वपूर्ण विषयों पर दिया जाता है। या कोई बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णायक या आपातकालीन स्थिति हो जिससे पूरे देश को अवगत कराया जाना आवश्यक हो।
निःसंदेह देश की आधी आबादी (महिला) को उसका पूरा हक मिलना चाहिए। लेकिन किसी भी बिल को पास करने में अगर सरकार सफल नहीं हो पाती है तो इसके लिए विपक्ष जिम्मेदार नहीं है। बल्कि सरकार का कमजोर होमवर्क जिम्मेदार है, क्योंकि वह विपक्ष को विश्वास में नहीं ले पाया। अगर विपक्ष को कोई शंका है तो उसका समाधान करना सरकार की जिम्मेदारी है।
क्या मोदी जी का जादू उतर रहा है...?
संसद के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित न होने के बाद सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ आ गई है। कई यूजर लिख रहे हैं कि, 2014 से चला आ रहा मोदी जी का जादू अब उतर रहा है। वही आपरेशन सिंदूर में अचानक संघर्ष विराम के फैसले से उनके कई समर्थक निराश नजर आए। वहीं पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार में अचानक एक दुकान पर झालमुडी खाने को लेकर भी सोशल मीडिया पर खूब आलोचना हो रही है।
एक युजर ने लिखा है कि, मोदी जी ने 10 रूपए में पूरे देश में भंडारा कर दिया। वहीं अन्य यूजर लिखते हैं कि, मोदी जी हर जगह कैमरा ले जाकर कैमरा जीवी बन गए हैं। अभी तक कई समर्थक जो मोदी जी के हर कदम को मास्टर स्ट्रोक बता रहे थे वह भी मोदी जी के खिलाफ हो गए हैं। वर्तमान में अमेरिका, ईरान युद्ध को लेकर भी तरह-तरह के मीम्स सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि, भाजपा और मोदी जी का ग्राफ जितना बढ़ना था बढ़ चुका है अब ढलान पर है ।
