माही की गूंज, झाबुआ।
भारत देश में गाय या गौमाता को लेकर बहुत कुछ कहा-सुना व लिखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में गाय का एक अलग ही स्थान है और कई शास्त्रों, पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख आता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार गाय में कई कोटी के देवताओं का वास भी माना जाता है। लेकिन देश की वर्तमान राजनीतिक स्थितियां इन सबको धत्ता साबित करने में लगी हुई है। अब गाय को भारत में राजनीतिक लाभ और हानि के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। इसका असर यह होता दिखाई दे रहा है कि, देश में सीधे तौर पर धार्मिक आस्था को राजनीतिक हितों के लिए गहरी ठेंस पहुंचाई जा रही है। जबकि राजनीतिक दल सीधे तौर पर धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देते दिखाई दे रहे है। वैसे तो गौ-माता आमजन के लिए आस्था का विषय है लेकिन राजनीति और सरकारों के लिए यह एक बहुत बड़े राजस्व का हिस्सा बन कर रह गई है। देश में गौ-हत्या के कई छोटे-बड़े मामले सामने आते है, जिन्हे राजनीतिक जामा पहना कर धार्मिक रंग दे दिया जाता है। आम लोगों को आपस में लड़वा दिया जाता है और फिर खूब राजनीतिक लाभ उठाया जाता है। मगर इसके उलट देश की सरकार इसी गौ-मांस से बीफ एक्सपोर्ट के नाम पर अरबों रुपयों का राजस्व हासिल कर रही है। राजनीतिक वसीकरण इतना है कि, देश के किसी भी कौने में गौ-हत्या या गौ-मांस को लेकर कोई विशेष कानून नहीं है। यानि सीधे तौर पर यह कहना भी गलत नहीं होगा कि, गौ-हत्या पर सरकार का कोई प्रतिबंध अब तक देखने को नहीं मिला है। यह और बात है कि, इस देश में गौ-हत्या व आस्था के नाम पर आमजन लड़कर मर रहा है। लेकिन सरकारों को इससे कोई लेना-देना नहीं है। जब कहीं गौ-हत्या का कोई मामला तूल पकड़ता है तो देश के तमाम राजनीतिक दल उसमें अपनी रोटियां सेकते दिखाई देते है।
वर्तमान में आदिवासी अंचल झाबुआ जिले में यह गौ-हत्या का मामला गर्माया हुआ है। झाबुआ जिले के मेघनगर ब्लॉक के ग्राम सजेली, नानियासाथ में पिछले दिसम्बर में एक बहुत बड़ा गौ-हत्या कांड सामने आया। इसको लेकर जिले के तमाम हिन्दु संगठनों ने विरोध किया मगर यह इतना प्रभावशाली नहीं था। सरकारों से केवल आश्वासन के झुनझुने ही कार्रवाई के नाम पर मिले है। हांलाकि पुलिसिया कार्यवाही में कई लोगों की गिरफ्तारियां दर्शाई गई है। अब जिले में इस मामले को लेकर बड़े स्तर पर आंदोलन हो रहे है। मगर क्या यह सब काफी है जिले व देश में गौ-हत्या रोकने के लिए...? जिले में बैठे अधिकारियों ने जिले के हिन्दुओं को आश्वासन का यह झुनझुना भी दिया कि, जिस क्षेत्र में गौ-हत्या हुई है उसे गौ-अभ्यारण बनाया जाएगा। लेकिन इसकी सार्थकता कब और कैसे सार्थक होगी यह किसी को नहीं पता। इसके उलट जब मामला इतना गर्माया तो सरकारों से भी सिर्फ आश्वासन ही मिलते दिखाई दे रहे है।
जब जिले के सजेली नानियासाथ में यह मामला सामने आया था तब माही की गूंज ने इस विषय पर पहल करते हुए विस्तृत खबरें प्रकाशित की थी। तमाम बिंदुओं को अखबार के माध्यम से उठाया था और सरकार से यह सवाल भी किया था कि, गाय अगर हमारी माता है तो फिर इसे राष्ट्रीय पशु क्यों नहीं घोषित करते...? सवाल अब भी यही है आखिर क्यों सरकारें इस पर इतना ढीला रवैया इख्तियार कर रही है...? जानकारों के मुताबिक यह सरकार के लिए सिर्फ राजनीति करने भर का जरिया है। अगर सरकार गाय को मां मानते हुए इसे राष्ट्रीय पशु घोषित कर देती है तो करोड़ों रुपए का बीफ एक्सपोर्ट का कारोबार ठप्प हो जाएगा और सरकार को कई अरबों -खरबों का नुकसान होना शुरू हो जाएगा। अभी कुछ दिन पहले तक की रिपोर्ट यह सामने आ रही थी कि, भारत बीफ एक्सपोर्ट में दुनिया में दूसरे या तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है, लेकिन अभी ताजा मामलों में यह एक पायदान और उपर उठकर पहले स्थान पर पहुंच चुका है। हम इसकी कोई अधिकारिक पुष्टी नहीं करते मगर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि, जो देश दूसरे या तीसरे स्थान पर बीफ एक्सपोर्ट करने में पहुंच सकता है वह पहले स्थान पर भी पहुंच सकता है।
यह विडम्बना ही कही जाएगी कि, जब धार्मिक मामला आता है तो गाय को राजनीतिक लोग व सरकारें मां बना लेते है, लेकिन जब राजस्व प्राप्ती का मामला आता है तो यही सरकारें और राजनीतिक लोग इसे आमदनी का हिस्सा मानकर इनकी हत्या कर विदेशों में एक्सपोर्ट कर देते है। सरकारों और राजनीति के लिए यह कोई आस्था का विषय नहीं है। यह महज आमजन के लिए आस्था का विषय हो सकता है। जिससे सरकारों और राजनीति को कोई लेना-देना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक दलों पर बीफ एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों से चंदा लेने के मामले सामने आ चुके है। मगर आस्था केवल आमजन की प्रभावित हुई है। देश के कई प्रदेश ऐसे है जहां खुद सरकारों ने गौकशी और बीफ के कारोबार को खुली छूट दे रखी है। जहां खुलेआम गौ-हत्याएं रोज होती है और गौमांस भी खुलेआम विक्रय किया जाता है।
अब सवाल आम आदमी की आस्था का है तो यह मान लिजिए कि, इसके लिए खुद आमआदमी को ही सड़क पर उतरना पड़ेगा। छोटे-मोटे आंदोलनों से यह किस्सा खत्म होने वाला नहीं है। इसके लिए पूरे देश में अलख जगानी होगी। गौ-माता में आस्था रखने वाले हर इंसान को खुलकर मैदान में उतरना पड़ेगा। हर राज्य, हर जिले, हर गांव व कस्बे में इस आंदोलन को ले जाने की आवश्यकता है। तभी हम गौ माता को बचा पाएंगे। अन्यथा सरकारें इस देश में कभी गौ-हत्या को बंद करने वाली नहीं है और ना ही गौ-माता को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने वाली है।

झाबुआ में गौ-हत्या के विरोध में एवं गाय माता को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए की मांग को लेकर सकल हिन्दु संगठन का बड़ा प्रदर्शन।
