अभियानों की रही भरमार लेकिन जमीनी स्थिति ढाक के तीन पात
माही की गूंज, झाबुआ।
वर्ष 2025 अलविदा हो गया है और 2026 की नई शुरूआत हो रही है। बीते वर्ष के आंकलन मीडिया और समाचार पत्रों में छाए हुए है। शासन, प्रशासन और पुलिस के पिछले वर्ष में किए गए क्रिया कलापों का बखान आसमान छू रहा है। लेकिन इसमें आलोचकों की बहुत भारी कमी है। इसलिए जिला प्रशासन और पुलिस बधाई की पात्र हो सकती है कि उन्होने सिर्फ और सिर्फ मीठा-मीठा गट ही स्वीकार किया है और कड़वा-कड़वा थू या नजर अंदाज ही किया है। वैसे तो साल के अंत की यह प्रक्रिया हमेशा से ही प्रचलन में रही है। मीडिया हर साल के अंत में इस तरह के आंकलन प्रकाशित करता आया है। यह बात और है कि, पिछले सालों में साल के अंत में प्रकाशित होने वाली प्रतिक्रिया कठोर और आलोचनाओं से भरी होती थी। लेकिन वाह रे मैनेजमेंट 2025 में हुए किसी भी गंभीर मामले को मीडिया या अखबारों ने आंकलन से दूर ही रखा है। जो दिखाई दे रही है वह सिर्फ और सिर्फ जिला प्रशासन और पुलिस की थोथी वाहवाही ही है।
2025 में यूं तो जिला प्रशासन और पुलिस ने कई तरह के अभियानों की शुरूआत की लेकिन साल का अंत आते-आते यह अभियान धुमिल होते ही नजर आए है। जिला प्रशासन और उसमें बैठे उच्चाधिकारियों ने मोटी आई अभियान को लेकर बह्ुत वाहवाही लूटी। इस अभियान को प्रदेश स्तर पर पहचान भी दिलाई। मगर इस अभियान की गर्मजोशी साल के अंत होते-होते ठंड के साथ ही ठंडी पड़ गई। कागजी घोड़े इतनी रफ्तार से दौड़े कि, पता ही नहीं चला अभियान कब शुरू हुआ, कब ख्याती मिली और पुरूस्कार मिले। लेकिन क्या इस अभियान का काम पूर्ण रूप से पूरा हुआ...? क्या वाकई जिला कुपोषण मुक्त हुआ...? जवाब किसी के पास नहीं है। इसी तरह रामा जनपद को आदर्श जनपद का अवार्ड तो मिलता है लेकिन ठीक उसी समय पर इसी जनपद में करोड़ों रूपए के घोटाले उजागर हो जाते है। इस बात से कल्पना की जा सकती है कि प्रशासन किस अंध गति से कागजी घोड़े दौड़ाता रहा है। लगभग प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे सभी अभियानों की हकीकत कुछ ऐसी है। जिनकी शुरूआत धूम धड़ाके के साथ प्रशासन ने की और सुर्खियां बटोरी। अखबारों में जोर-सोर से सामाचार प्रकाशित करवाया गया। लेकिन साल के अंत तक उनकी हकीकत ढाक के तीन पात ही साबित हुई है। हर घर जल, हर घर नल योजना भी ऐसी थी लेकिन 2025 गुजर जाने के बाद भी इस योजना का लाभ जिले के कई गांवों को अब तक नहीं मिल पाया है। टंकिया बन कर तैयार है, पानी की पाइप लाइन बिछाई जा चुकी है, लेकिन इनमें सप्लाय करने का पानी उपलब्ध नहीं है। नतीजा यह निकल कर सामने आया कि, लोगों के घर नल तो पहुंच गया लेकिन जल अब तक उन नलों से बाहर नहीं निकल सका है। ऐसा नहीं है कि, इस तरह की योजनाओं और अभियानों की शिकायतें नहीं होती है। जागरूक जन जब इस तरह के मामलों की शिकायत जिला स्तर या सीएम हेल्प लाइन पर करता है। तब या तो उसे भ्रष्टों और गैर जिम्मेदारों की धमकियों का सामना करना पड़ता है या फिर उस पर इस कदर दबाव बनाया जाता है कि, वह हार कर अपनी शिकायत वापस ले लेता है। 2025 में तो शायद इस तरह के मामलों को प्रमाणित करने की आवश्यकता ही नहीं है। इस तरह की घटनाओं से अखबारों के पन्ने भरे पड़े है। यह और बात है कि, अगर कोई अखबार जिला प्रशासन की आलोचना या भ्रष्टाचार को उजागर करता तो प्रशासन उसके अगले ही दिन किसी बड़े अखबार में उस मुद्दे पर सफाई या सफलता पेश करता नजर आया है। कुल मिलाकर 2025 में जिला प्रशासन और उसमें बैठे अधिकारियों की यह नियति रही कि, किसी भी तरह का नकारात्मक समाचार वे या तो बर्दास्त नहीं कर सके या फिर उस समाचार के विपरीत जाकर अन्य अखबारों में अपनी कामयाबी के कसीदे गढ़वाए गए। बावजूद इसके इसे विडम्बना ही कहेंगे कि, जिला मुख्यालय पर कलेक्ट्रोरेट बिलिं्डग में ही इस साल 2 से 3 रेड लोकायुक्त ने डाली और रिश्वत लेते भ्रष्टों को गिरफ्तार किया। अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर कलेक्ट्रोरेट कार्यालय ही रिश्वत खोरों से अछूता नहीं है तो प्रशासन कितना ही अपने मुंह मियां मिट्ठू बने क्या फर्क पड़ता है।
वहीं पुलिस विभाग की बात की जाए तो इनका 2025 भी सिर्फ और सिर्फ थोथी वाहवाही लूटने में ही निकला है। पुलिस महकमें के आला अधिकारियों ने मीडिया में बने रहने और सुर्खियां बटोरने का ऐसा बीड़ा उठाया था कि जिस दिन साहब की फोटो अखबार में न छपे उस दिन नींद ना आए। खैर समय चक्र है अधिकारियों का आना-जाना लगा रहता है। हर आता-जाता अधिकारी जिले में नए सगुफे छोड़कर वाहवाही लूटकर चला जाता है। ऐसे ही कुछ पूर्व जिला अधिकारियों की भी कहानी रही है। जिले में 3डी नाम से चलाया गया अभियान किसका है यह तो पता नहंी लेकिन अधिकारियों ने इसे अपने नाम कर लिया और जमकर सुर्खियां बटौरी। आदिवासी तीज त्यौहारों पर वे अपनी ही मन गडं़त गाथाओं की किताबें छपवाकर वाहवाही लूट ले गए। मगर इसका विरोध भी ऐसे अधिकारियों को झेलना पड़ा। कानून व्यवस्था के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सामाजिक पुलिसिंग का गाना गाया गया। मगर उनके इस सामाजिक पुलिसिंग के बावजूद जिले में अपराधों में किसी तरह की कोई कमी दिखाई नहीं दी। यह और बात है कि कागजी घोड़े जमकर दौड़ाए गए। जिले की पुलिस ने कई दिवस ऐसे भी मनाए जिनके बारे में शायद जिलवासियों ने पहले कभी सुना भी न था, इन्ही दिवसों में से एक था साइकिल दिवस। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए भी पुलिस प्रशासन ने कागजी घोड़े दौड़ाए और वाहवाही लूटी लेकिन नतीजा अब भी वही ढाक के तीन पात है। जिन दुर्घटना क्षेत्रों को ब्लेक स्पॉट पहले माना गया था उन में अब भी कोई सुधार नहीं हुआ है। इन स्थानों की स्थिति 2024 में भी वही थी जो आज 2025 के गुजरने के बाद है। हां इन ब्लेक स्पॉर्टो को सूची से बाहर करने के लिए छोटे मोटे उपाय पुलिस विभाग ने जरूर किए, मगर इन्हे खत्म करने के लिए कोई ठोंस कदम अब तक उठाया ही नहंी गया। जिस हेलमेट अभियान को पुलिस विभाग ने खुद से शुरू किया था, वह अभियान भी 2025 के जाने के बावजूद जनता तक नहीं पहुंच पाया और पुलिस विभाग का यह अभियान खुद से शुरू होकर खुद पर ही सिमट कर रह गया। अब 2026 की शुरूआत के साथ ही फिर से यह राग नए तरीके से अलापा जा रहा है। 2026 में यह कितना कामयाब होगा यह समय के गर्त में है या फिर वही होगा जो अब तक होता आया है। नए अधिकारियों के आने के साथ अभियान शुरू होते रहेंगे और उनके जाने के साथ ही समाप्त भी हो जाएंगे।
हम यहां किसी भी अभियान का विरोध नहीं कर रहे लेकिन इन अभियानों में कार्यरत अधिकारियों पर तो हमेशा से ही सवाल उठते रहे है। उनकी कर्तव्य निष्ठा पर भी सवाल उठते रहे है, उनके भ्रष्टाचार का भी भंाडाफोड़ होता रहा है। कई लोकायुक्त के हत्थे चढ़े है, तो कईयों ने निलंबन व सेवा समाप्ति जैसी कार्रवाईयों को झेला है। हमारा विरोध तो सिर्फ यह है कि जो हो नहंी हो सकता उसे दिखाईये मत, उससे वाहवाही लूटने का ढकोसला मत कीजिए। बल्कि जो हो सकता है उस पर काम कीजिए, कहीं गलती होती है तो सुधार कीजिए। लोगों से संवाद कीजिए, अगर कहीं निचले स्तर पर कमियां है तो कनिष्ठ अधिकारियों पर सख्ती कीजिए। क्योंकि अखबारों से सुर्खियां बटोरना, अपने लिए जीना, कामयाब होना, सम्मान और पुरूस्कार लेना यह सब तो आसान है लेकिन आमजन की सेवा और ठेठ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचकर मदद करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं। कर्तव्य को समझते हुए कर्तव्यपरायणता से उसे अंजाम देने का नाम ही कामयाबी है। प्रशासन और पुलिस दोनों को ही अपनी कार्य शैली में भारी बदलाव की आवश्कता है, दिखावें के कार्यों को छोड़कर कर्तव्यनिष्ठा पर ध्यान देने की आवश्यकता है। 2025 बीत चुका है और कहते है बीते हुए समय से सीख लेकर बढ़ने से आने वाला समय बेहतर हो जाता है। तो 2026 के आगमन पर यही शुभकामनाएं है कि इस वर्ष पुलिस व प्रशासन की ओर से जो भी अभियान जनता की भालाई के लिए शुरू हो वह 2026 के अंत तक प्रभावी परिणाम देकर जाए और 2027 के आगमन जिला प्रशासन और पुलिस को आलोचनाओं का सामना न करना पड़े।
