माही की गूंज, झाबुआ।
राजनीति को काजल की कोठरी के समान कहा गया है और इस काजल की कोठरी में सफेद कपड़े पहनकर पाक साफ निकलना ही अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। वही भारतीय राजनीति में इस तरह के भी उदाहरण है जहां राजनीतिक जीवन में संतत्व का जीवन जिया और अवसान के बाद भगवान का दर्जा प्राप्त कर गए। आज उनको भगवान की तरह पूजा जाता है, उनके नाम की मन्नते ली जाती है यही नहीं अपनी फसल का पहला अंश उनको भोग (चढ़ाया) लगाया जाता है उसके बाद ही सेवन किया जाता है। और पुण्यतिथि पर बगैर किसी निमंत्रण के खुद के खर्चे व श्रद्धा भाव से श्रद्धांजलि अर्पित करने श्रृद्धालु पहुंचते हैं। वर्तमान राजनेताओं द्वारा भीड़ इकट्ठा करने के लिए क्या-क्या जतन किए जाते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन मामाजी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए श्रद्धालु पूरे श्रद्धा भाव से बगैर किसी सुविधाओं की उम्मीद किए कड़कड़ाती ठंड में पैदल या अपनी सुविधानुसार साधन से पहुंचते हैं। रात-भर भजन कीर्तन करते हैं और सुबह मामाजी की समाधि पर नारियल-फूल-अगरबत्ती चढाकर वापस अपने घरों की ओर प्रस्थान करते हैं। तथा मामाजी के प्रति श्रद्धा भाव रखने वाले सभी आयु वर्ग के पुरुष-महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में बच्चे भी शामिल रहते हैं।
मामा बालेश्वर दयाल दीक्षित जिन्हें प्यार से अंचल के लोग मामाजी कह कर पुकारते थे और मध्यप्रदेश और राजस्थान के लोग भगवान की तरह पूजते हैं। मामाजी ने अपना पूरा जीवन अंचल के भोले-भाले आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए संगठित किया था। मामाजी का जन्म 10 मार्च 1905 उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ था, प्रारंभिक जीवन से ही मामाजी सदैव सत्याग्रह के लिए अटल रहे, दीन दुखियों, आदिवासियों, दलितो, शोषितो व वंचितों के लिए अनेक बार संघर्ष करते हुए जेल तक गए।
मामाजी ने अनेक संघर्षों से लड़ते हुए मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के बामनिया ग्राम को अपनी कर्मभूमि बनाया और अंतिम सांस 26 दिसंबर 1998 को भी यहीं पर ली। अंचल के लिए किए गए कार्यो ने ही अंचल के आदिवासियों में उन्हें भगवान का दर्जा दिलाया है। मामाजी ने अंग्रेजी हुकूमत के समय ही आदिवासियों को अन्नदाता कहकर संबोधित किया था। जबकि उस समय अन्नदाता कहने पर अंग्रेज दंडित करते थे।
मामाजी के पदचिन्हों पर चलकर ही यहां के आदिवासी भगत परंपरा को स्वीकार कर सादगी पूर्ण, सात्विक जीवन यापन कर रहे हैं। मामाजी का संपूर्ण जीवन सामाजिक कार्यकर्ता, राजनेता व समाज सुधारक के रूप में आदिवासियों के कल्याण के लिए समर्पित रहा। उनका जीवन दर्शन आज की पीढ़ी के लिए नित्य प्रेरणा देने वाला है।
1977 से 1984 तक मामाजी मध्यप्रदेश से राज्यसभा सदस्य (सांसद) भी रहे। इस दौरान वे समाजवादी पार्टी और बाद में जनता पार्टी के सदस्य भी रहे। राज्यसभा के सदस्य होने के बावजूद उन्होंने अपना बामनिया कभी नहीं छोड़ा और आदिवासियों के लिए सामाजिक कार्य करते रहे। 1995 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा इंदिरा गांधी समाज सेवा पुरस्कार दिया गया। वहीं राजस्थान में उनके नाम पर मामा बालेश्वर दयाल सरकारी कॉलेज बनाए गए हैं। उनके सम्मान में मध्यप्रदेश और राजस्थान में कई जगहों पर उनकी मूर्तियां स्थापित की गई है।
मामाजी की पुण्यतिथि पर माही की गूंज परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।
