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आदिवासी जिलों में धर्मांतरण का असल दोषी कौन...? ईसाई मिशनरी, हिन्दु समाज, हिन्दुवादी संगठन या फिर खुद आदिवासी समाज...?
18, Dec 2025 1 month ago

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माही की गूंज, झाबुआ।

     यूं तो आदिवासी जिला हमेशा से ही हर किसी के लिए दुधारू गाय साबित हुआ है। जिसका सबसे बड़ा फायदा राजनीतिक दलों ने उठाया है। इन जिलों में शायद ही ऐसा कोई गैर कानूनी काम हो जो नहीं हो रहा हो। मगर कभी किसी राजनीतिक दल ने इन अवैध कामों, गैर कानूनी धंधों और माफियागिरी पर नकेल कसने की कोई दिखलौटी पहल भी नहीं की। जिले में होने वाले गैर कानूनी कामों और धंधों की एक लम्बी फहरिस्त है। अगर बात झाबुआ-आलीराजपुर जिलों की करें तो यहां शराब तस्करी, अवैध वनों की कटाई, किमती लकड़ियों की तस्करी, अवैध खनन, अवैध नशीले पेय पदार्थ, रेत का अवैध परिवहन, जमीनी खनीजों का अवैध परिवहन जैसे कई अवैध और गैर कानूनी कार्य इन जिलों में आसानी से देखने को मिल जाएंगे। मगर किसी भी जननेता या जनप्रतिनिधि को इनके खिलाफ आवाज उठाते कभी नहीं देखा गया। कारण यह कि, अंदरखाने की खबर रखने वाले खबरनवीसों से यह पता चलता है कि, हर एक अवैध काम या अवैध धंधे से इन सफेदपोश नेताओं, जनप्रतिनिधियों को अवैध कमाई का हिस्सा आसानी से माफिया पहुंचा देते है। फिर इसमें किसी भी राजनीतिक पार्टी या दल के रसूखदार क्यों ना हो, माफिया इनके आगे टूकड़े डालकर इनके मुंह पर पट्टी लगा देते है। इन सब के बीच एक बहुत बड़ा मुद्दा जिले में दशकों से चल रहा है और वर्तमान में यह गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है, वह है धर्मांतरण का मुद्दा। तमाम तरह के सूत्र और स्थितियां यह बता रही है कि, आदिवासी जिले के मूल निवासियों का धर्मांतरण पिछले कई दशकों से करवाया जा रहा है। उन्हे येन-केन प्रकारेण ईसाई धर्म अपनाने के लिए मनाया जा रहा है और इस अंचल के आदिवासीजन इसे स्वीकारते भी जा रहे है। मगर इन्हे रोकने वाला पिछले कई दशकों में कोई गंभीर या मजबूत अभियान कहीं भी दिखाई नहीं दिया है।

     इन दिनों इन दोनों ही जिलों में धर्मांतरण का मुद्दा भी जमकर उछाले मार रहा है। वही बड़ी मात्रा में गौवंशी हत्या के भी मामले सामने आ रहे है। आरोप भी लग रहे है कि, यह काम धर्मांतरित लोगों का है। मगर बावजूद इसके इस मामले में कोई भी आवाज उठाने को तैयार नहीं है। चाहे फिर वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी को सांप सूंघ गया है। तमाम हिन्दु संगठन भी इस पर कोई खास प्रतिक्रिया देते नहीं दिखाई दे रहे है। जबकि मेघनगर क्षेत्र में उजागर हुआ गौवंशी का मामला बहुत ही जघन्य दिखाई पड़ रहा है। हालंाकि ऐसा नहीं है कि, धर्मांतरण के यह मामले कोई नए है। पिछले कई दशकों से झाबुआ-आलीराजपुर जैसे आदिवासी जिलों को धर्मांतरण ने अपनी जद में ले रखा है। ऐसा भी नहीं है कि, इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई जाती, लेकिन जब-जब इस मुद्दे पर आवाज उठती है वह कुछ ही समय के बाद ठंडी पड़ जाती है। ऐसा क्यों होता है...? इसका कोई ठोस कारण अब तक सामने नहीं है, लेकिन जिले में चर्चा का विषय यह है कि, मुद्दा धर्मांतरण का है ही नहीं, मुद्दा तो अवैध उगाही का है। जो संगठन विरोध करते है उनका भी उद्देश्य कुछ इसी तरह का होता है। बातें कई होती है लेकिन स्थाई रूप से अमल किसी पर भी नहीं होता है। महज विरोध की नौटंकिया होती है और हर कोई अपने रास्ते चल देता है। धर्मांतरण को लेकर राजनीतिक पार्टियां कई तरह से धर्मांतरण को रोकने की घोषणाएं करती है लेकिन इन घोषणाओं को कभी अमली जामा नहीं पहनाया जाता। धर्मांतरित लोगों से आरक्षण और सुविधाएं छीनने की बात कही जाती है, लेकिन सरकारें कभी इस मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं दिखाई दी। वजह यह है कि, सरकारें भी जानती है कि अगर इस तरह के मुद्दे को जोर दिया तो सत्ता और सिंहासन डोल सकता है। और तो और हिन्दु समाज भी इस मुद्दे को लेकर गंभीरता नहीं दिखा रहा है। जिले में बड़ी मात्रा में गौ हत्या का खुलासा होने के बावजूद न तो किसी हिन्दु संगठन ने कहीं कोई ठोस विरोध प्रदर्शन किया और ना ही जिले का कोई  नगर विरोध प्रदर्शन के रूप में बंद रहा। कुछेक हिन्दु संगठनों ने जरूर प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपे। लेकिन स्थिति बताने वाले बताते है कि, जिले के आला अधिकारियों ने इन हिन्दु संगठन के कर्ता-धर्ताओं को घांस तक नहीं डाली। नतीजा यह हुआ कि इंदौर स्तर के अधिकारियों को भी ज्ञापन देना पड़ा।

    अब बात करें आदिवासी जिलों में धर्मांतरण की तो यह सब तो पिछले कई दशकों से चला आ रहा है। जिले के कई -कई गांव पूरी तरह से धर्मांतरित हो चुके है, तो फिर अब इस स्थिति में विरोध का क्या तुक बनता है? जिले में धर्मांतरण को रोकने के लिए जो पहल होनी थी वह बहुत पहले हो जानी थी। इसको लेकर कड़े कानून है, लेकिन कभी किसी हिन्दुवादी संगठन ने इस ओर कोई स्थाई व ठोस पहल नहीं की। हालंाकि पिछले कुछ दसकों में धर्मांतरण को लेकर कुछ हिन्दुवादी संगठन जरूर मुखर हुए है, लेकिन अब पानी सर के उपर पहंुच जाने वाली स्थिति निर्मित हो चुकी है। जिले के कई गांव तो इस कदर धर्मांतरित हुए है कि, अब हिन्दु संगठन अगर उनकी घर वापसी की बात भी करता है तो वह महज जुम्लेबाजी साबित होगी। भले ही सरकारी कागजों में यह धर्मांतरण गायब हो लेकिन हकीकत यही है कि, जिले के ग्रामीण अंचलों में 75 प्रतिशत से अधिक आबादी अब क्रिस्चीनीटी को अपना चुकी है। ग्रामीणों के गले में लटकने वाले क्रूस इस बात की स्वतः ही गवाही देते नजर आते है। यह इस बात की भी गवाही है कि, जिले में बदलते परिवेश और धर्मांतरण को हिन्दुवादी संगठनों और समाज ने भी नजर अंदाज ही किया है। अब जब धर्मांतरित हुए लोग जो गाय को माता नहीं मानते और गाय का मांस सेवन करते है, वह स्वाभाविक रूप से गौहत्या तो करेंगे ही। इस पर हिन्दु संगठनों का तिलमिलाना कोई मायने नहीं रखता। हम यहां किसी भी जीव हत्या का समर्थन नहीं करते लेकिन जिले में इनते बड़े स्तर पर हो रहे धर्मांतरण और गौ-हत्याओं का आखिर दोषी कौन है...? क्या हिन्दुवादी संगठन और समाज इसमें दोषी नहीं है...? जो अपने धर्म को सही ढंग से आदिवासियों तक नहीं पहुंचा पाए। क्या वर्णभेद इसमें दोषी नहीं है जो आदिवासियों को नीचले तबके का मानता है...? आखिर क्यों हिन्दुवासी संगठन या समाज, आदिवासी समाज को वह सम्मान और स्थान नहीं दे पाया जो ईसाई धर्म अपनाने के बाद उन्हे मिला...? क्यों उन्हे वह सुविधाएं नहीं पहुंच पाई जो ईसाई मिशनरी ने उन तक पहुंचा दी। क्यों आदिवासी क्षेत्रों में हिन्दु धार्मिक कथाएं, रामायण पाठ और इस तरह के आयोजनों की कमी है...? क्यों उन तक धार्मिक ग्रंथो का ज्ञान नहीं पहुंच पाया...?

    क्या आदिवासी समाज को धर्मांतरण से बचाने का यह एक ही रास्ता है कि, ईसाई मिशनरी का विरोध किया जाए...? अपने ही हिन्दु आदिवासियों से संवाद की बजाय शासन-प्रशासन के अधिकारियों को ज्ञापन सौंपे जाए...? माहौल को गर्माया जाए...? अगर इन सबसे ही धर्मांतरण रूकता तो शायद कई दशकों पहले रूक चुका होता और आज धर्मांतरण को लेकर जिले की जो स्थितियां है वह पैदा ही नहीं होती। विरोध और प्रदर्शन तो हिन्दुवादी संगठन पिछले कई दशकों से करते आ रहे है, तो क्या आदिवासी जिलों में धर्मांतरण रूक गया...? जिले में विहिप लगातार पिछले कई दशकों से धर्मांतरण का विरोध कर रही है, लेकिन उसके हाथ वह कामयाबी नहीं लगी जो लगनी चाहिए थी। इसके उलट ईसाई मिशनरी ने हिन्दुवासी संगठनों के किसी विरोध प्रदर्शन का जवाब नहीं दिया। उसने जमीनी स्तर पर अपने धर्म को फैलाने के लिए हर विरोध को नजर अंदाज कर आदिवासियों में ईसाई धर्म की बात की। परिणाम आज सबके सामने है। जिले के हर क्षेत्र में ईसाई मिशनरी के चर्च आसानी से देखने को मिल जाएंगे। इन चर्चों में वर्ष भर ईसाई धर्म के धार्मिक आयोजन होते हुए मिल जाएंगे। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि, जो सुविधाएं सरकार को आदिवासियों के लिए करनी थी वह इन आदिवासी जिलों में मिशनरी ने कर डाली। शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रीत कर हर आदिवासी तक पहुंचने की कोशिश की और यह कोशिश आज भी लगातार जारी है। हां यह भी जरूर है कि, जिले में ईसाई मिशनरी द्वारा जबरन धर्मांतरण कराने के कई मामले सामने आए है, जो गैर कानूनी और अवैध है। मगर बावजूद इसके मिशनरी ने अपनी जड़े इस तरह इन जिलों में फैला दी है कि, अब फादर भी आदिवासी है तो बिशप भी आदिवासी। तो सवाल तो उठता ही है कि, आखिर आदिवासी जिलों में धर्मांतरण का असल दोषी कौन... ईसाई मिशनरी, हिन्दु समाज, हिन्दुवादी संगठन या फिर खुद आदिवासी समाज...?


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