माही की गूंज, झाबुआ डेस्क।
संजय भटेवरा
चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान में कई चैंकाने वाले खुलासे हो रहे। जिसके बाद तो यही कहा जा रहा है कि, मतदाता सूची का पूरनिरीक्षण का कार्य सतत चलने वाली प्रक्रिया होना चाहिए। ताकि इस प्रकार विशेष अभियान ना चलाना पड़े। लोकतंत्र की मूल आत्मा निर्वाचन यानी चुनाव है और चुनाव बिना निर्वाचन नामावली के संभव नहीं है। अगर मतदाता सूची ही शुद्ध नहीं होगी तो निर्वाचन शुद्ध कैसे हो सकता है...? इसलिए चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान का हर भारतीय को न केवल समर्थन करना चाहिए वरन चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त बूथ लेवल अधिकारी को यथा संभव मदद भी करना चाहिए। क्योंकि यह एक राष्ट्रीय कार्य है और राष्ट्रीय कार्य के लिए चुनाव आयोग या सरकारी कर्मचारी ही नहीं बल्कि एक आम भारतीय नागरिक की जिम्मेदारी बनती है।
एक घर में 104 वोटर
इस एसआईआर सर्वे में भोपाल से एक हैरान करने वाला तथ्य सामने आया जहां एक परिवार में 104 वोटर है। लेकिन उस परिवार में केवल चार लोग ही निवासरत है। भोपाल की नरेला विधानसभा के बूथ क्रमांक 57 के मकान नंबर एक का यह मामला है। मोहल्ले और आस पड़ोस के लोग भी इस बात से अब तक अनभिज्ञ थे। यही नहीं एक परिवार के 21 जातियों के लोगों के निवासरत होने की बात सामने आई है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि, इस तरह की घटनाएं सामने आने के बाद भी लोग क्या एसआईआर का विरोध करेंगे...?
बीएलओ के बारे में आयोग का संज्ञान
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट के जरिए एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा। और लिखा कि, एसआईआर सुधार नहीं बल्कि थोपा गया जुल्म है।
एसआईआर के नाम पर देशभर मे अफरा-तफरी मची है जिसका नतीजा है कि, देशभर में 23 बीएलओ की जान अबतक चली गई जिसका कारण तनाव, हार्ट अटैक व आत्महत्या है। जिसके बाद चुनाव आयोग ने संज्ञान लिया है और इस संबंध में राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गई है। आयोग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक बिहार में तो इन राज्यों से कम समय में एसआईआर हुआ। लेकिन वहां ऐसी एक भी घटना सामने नहीं आई। जबकि बिहार में एसआईआर काम में लापरवाही बरतने के आरोप में लगभग 450 बीएलओ को निलंबित भी किया गया था। निश्चित रूप से अगर इतनी संख्या में बीएलओ की मौते हुई है तो निष्पक्ष जांच की जाना आवश्यक है।
एक घटना और घटित हो गई जिसमें विदिशा के शासकीय आवास से तीसरी मंजिल से गिरकर एक महिला अधिकारी नायब तहसीलदार कविता कड़ेला की मौत हो जाती है। जिसके बाद इस घटना के पीछे एसआईआर का तनाव बताया जा रहा है। अब ये जांच के बाद ही पता चल सकता है कि, यह घटना हत्या है... आत्महत्या है... या एसआईआर का तनाव है...? बहरहाल एसआईंआर को लेकर आयोग द्वारा अधिकारियों पर इतना दबाव बनाना भी ठीक नहीं है। आयोग फील्ड की हकीकत को समझकर माननीय दृष्टिकोण अपनाते हुए भी कार्य को पूरा करवा सकता है। क्योंकि अंततः काम तो फील्ड के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा ही पूर्ण किया जाएगा और फील्ड की व्यवहारिक परेशानियां दिल्ली और भोपाल के ऐसी ऑफिस में बैठकर नहीं समझी जा सकती है। निश्चित रूप से एसआईआर अपेक्षाकृत एक श्रम साध्य प्रक्रिया है जो जटिल अवश्य है लेकिन असंभव नहीं है। ऐसे में बीएलओ इस राष्ट्रीय महत्व के कार्य को पूरे तन-मन के साथ पूर्ण करने में जुड़े हैं। कई बीएलओ ने समय पूर्व ही 100 प्रतिशत कार्य पूर्ण कर दिया है जो अन्य बीएलओ के लिए प्रेरणादायक है। बीएलओ लोकतंत्र के प्रहरी बनकर मोर्चे पर डटे है। ऐसे में अगर फील्ड में कोई भी व्यावहारिक दिक्कत आ रही है तो उसका यथोचित समाधान भी चुनाव आयोग द्वारा मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर किया जाना चाहिए। क्योंकि काम का पूरा होना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना काम का सही व ढंग से पूर्ण किया जाना। एसे में अगर समय की कमी होने पर समयावधि की बढ़ोतरी करना भी सही निर्णय रहेगा।
