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उपराष्ट्रपति का इस्तीफाः असंतोष की शुरुआत या स्वास्थ्य का बहाना ...?
28, Jul 2025 9 months ago

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माही की गूंज, संजय भटेवरा।

    नई दिल्ली। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में पिछले दो कार्यकाल की अपेक्षा कमजोर सरकार है। हालांकि भाजपा अब भी 240 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है लेकिन पूर्ण बहुमत से दूर ही है। अब तक शीर्ष नेतृत्व के हर फैसले को पार्टी की अन्य छोटी इकाई अक्षरशः पालन करते नजर आई है। यही नहीं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में कई बार अप्रत्याशित फैसले लेते हुए न केवल राजनीतिक पंडितों को चौंकाया है वरन आम जनता को भी अचंभित किया ह। चाहे वह राजस्थान में पहली बार बने विधायक को मुख्यमंत्री बनाना हो या मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद  का चयन हो, हर बार शीर्ष नेतृत्व ने लिक से हटकर फैसले लिए और पूरी एक जुटता के साथ लागू किए। लेकिन वर्तमान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक अप्रत्याशीत कदम उठाते हुए मानसुन सत्र के पहले ही दिन अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है जो कि राजनीतिक पंडितों के लिए शोध का विषय बन गया है। हालांकि किसी भी व्यक्ति का अपने पद पर रहना या नहीं रहना उसने स्वयं के विवेक पर निर्भर करता है और जगदीप धनखड़ ने अपने स्वास्थ्य का हवाला दिया है। लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि, स्वास्थ्य तो केवल बहाना असली कहानी तो पर्दे के पीछे की है जिसको निर्वतमान उपराष्ट्रपति द्वारा केंद्र सरकार के साथ ताल मेल न बैठ पाना है। जिसको लेकर वे अपने आप को असहज महसूस कर रहे थे।

    वहीं कई लोगों का मानना है कि, यह नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ असंतोष की चिंगारी है तो देर सवेर भड़क भी सकती है। क्योंकि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है और वर्तमान में मोदी सरकार पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं है। विपक्ष हमेशा से ही मोदी सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाती रही है लेकिन कमजोर संख्याबल के आगे विपक्ष की आवाज उतनी धारदार नहीं रही लेकिन उपराष्ट्रपति के  इस्तीफे के बाद विपक्ष को मोदी सरकार को घेरने का एक और मुद्दा मिल गया। हालांकि विपक्ष अभी भी इतना ताकतवर नहीं हुआ है कि, वो मोदी सरकार को अस्थिर कर सके। लेकिन इस मुद्दे को वो सरकार के खिलाफ भुना अवश्य सकता है और आम जनता में यह संदेश पहुंचा सकता है कि, मोदी सरकार के फेसलो पर असंतोष उभरने लगा है।

इस्तीफे पर कई सवाल

        दिन भर कोई व्यक्ति अपने काम में मशगुल रहे  और रात में अचानक अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए त्यागपत्र दे दे तो यह बात आम जनता को भी हजम नहीं होती है। और जब मामला देश से जुडा हो तो सवाल उठाना  लाजमी है कि आखिर ऐसा क्या हुआ...? उपराष्ट्रपति के मामले में भी ऐसा ही हुआ क्योंकि वे सदन में दिन भर सक्रिय थे और रात को अचानक स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। हालांकि स्वास्थ्य का कारण व्यक्तिगत कारण है और वह चर्चा का विषय नहीं बनना चाहिए। लेकिन उपराष्ट्रपति के इस्तीफे पर कई सवाल उठ रहे हैं और उन सवालों के जवाब आम जनता को मिलना चाहिए। लेकिन यह कहा नहीं जा सकता है कि, सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे...?

    आम लोगों का मानना है कि, जगदीप धनखड़ एक तेज तर्राट और बेबाक नेता है ऐसे में वे केंद्र सरकार के हर फैसलों को मौन समर्थन नहीं दे सकते थे। विभिन्न मुद्दों पर पिछले दिनों उन्होंने सरकार के प्रतिकुल वक्तव्य देने में संकोच नहीं किया था। यही नहीं वे सुप्रीम कोर्ट को भी निशाने पर ले रहे थे। वे पेशे से वकील थे इसलिए उनकी कानूनी समझ को नकारा नहीं जा सकता था। विभिन्न विषयो पर उनकी बेबाकी सरकार के साथ ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को भी रास नहीं आ रही थी। लेकिन अचानक घटे इस घटनाक्रम के बाद जो कांग्रेस उपराष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग लाने का मन बना रही थी वहीं कांग्रेस उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के बाद उन्हें अचानक नेक, विनम्र, निष्पक्ष और गुणी बताने में जुड़ गई। इसलिए कहा गया है कि राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन।

    बहरहाल उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के तत्कालीक रूप से कोई राजनीतिक हलचल नहीं होगी लेकिन इसके दूरगामी परिणाम निश्चित रूप से सामने आएंगे। और कई राजनीति पंडित इसे मोदी सरकार के खिलाफ असंतोष की शुरुआत भी कह रहे हैं। अब आगे क्या होता है यह तो भविष्य के गर्भ में है ।


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