नम आँखों से जैन एवं जैनेत्तर समाज ने दी अंतिम विदाई, बैंड-बाजों के साथ निकली भव्य डोल यात्रा
माही की गूंज, थांदला।
जिनशासन को समर्पित चारित्र आत्माओं का जीवन ही नहीं, उनका अंतिम क्षण भी साधना का सर्वोच्च स्वरूप माना जाता है। इसी आध्यात्मिक परंपरा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए परम पूज्य महामना आचार्य श्री 108 कुशाग्रनंदीजी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में संघस्थ आर्यिका 105 श्री विनम्रज्योति माताजी का सल्लेखना पूर्वक उत्कृष्ट समाधि मरण बुधवार रात्रि लगभग 12:15 बजे सम्पन्न हुआ।
पूज्य माताजी विषय-कषायों का त्याग कर पूर्ण आत्मसाधना में लीन थीं। चातुर्मास के लिए वे मुंबई से थांदला पधारी थीं तथा पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। सल्लेखना व्रत के साथ उनका शांत एवं आध्यात्मिक समाधि मरण जैन परंपरा में साधना की पूर्णता का प्रतीक माना गया।
पूज्य माताजी के अंतिम मनोरथ की सिद्धि पर श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक संतोष व्यक्त किया, वहीं एक महान चारित्र आत्मा के देवलोकगमन से संघ एवं समाज में गहरा शोक भी व्याप्त रहा।
पूज्य माताजी की अंतिम यात्रा श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर से खजूरी में गोमटगिरी तीर्थ तक अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निकाली गई। बैंड-बाजों के साथ निकली डोल यात्रा में दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन समाज सहित बड़ी संख्या में जैन-जैनेत्तर नागरिकों ने नम आँखों से अंतिम विदाई दी।
इस अवसर पर श्वेतांबर स्थानकवासी जैन संघ में तत्त्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी महाराज आदि ठाणा-8 एवं पूज्या श्री निखिलशीलाजी महासतीजी आदि ठाणा-4 के पावन सानिध्य में आयोजित धर्मसभा में चार लोगस्स का काउसग्ग किया गया तथा पूज्य माताजी को मोक्षमार्ग की निरंतर आराधना एवं जिनशासन का सानिध्य प्राप्त होता रहे, ऐसी मंगलभावना व्यक्त की गई
पूरे नगर में पूज्य आर्यिका श्री के समाधि मरण पर श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य का वातावरण देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने इसे एक महान तपस्विनी के तप, त्याग और आत्मसाधना को भावपूर्ण नमन बताया।

