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क्या फ्री बीज योजनाएं एंटी इनकम्बेंसी की काट है...?
20, Nov 2025 3 months ago

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माही की गूंज, झाबुआ डेस्क।

संजय भटेवरा

    लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है और जनता का निर्णय कभी गलत नहीं होता है, क्योंकि पब्लिक ईज ऑलवेज राइट। हाल ही में संपन्न हुए बिहार चुनाव के बाद देश में एक नई बहस ने जन्म ले लिया है वो यह है कि, क्या फ्री बीज योजनाएं एंटी इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) की काट है...?

    बिहार में पिछले दो दशक से सत्तारूढ़ गठबंधन ने न केवल सत्ता में वापसी की वरन पहले के मुकाबले और अधिक संख्याबल के साथ सरकार बना ली है। जिसके पीछे मुख्य कारण नीतीश कुमार सरकार की चुनाव की घोषणा से ठीक पहले महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपए देने के निर्णय का बताया जा रहा है। जिसके बाद यही कहा जा रहा है कि, इस तरह की मुफ्त की योजनाएं, सत्ता विरोधी लहर को सत्ता की लहर बनाने में सहायक हो रही है। पिछले कुछ चुनावो के परिणामों को देखे तो चुनावी राज्यों में तत्कालिक सरकार द्वारा महिलाओं को सीधे लाभ देने की योजनाओं का रहा है। जिसके बाद प्रत्येक चुनावी राज्य में इस तरह की योजनाएं गेम चेंजर की भूमिका में नजर आ रही है और सत्ता विरोधी लहर को बेअसर साबित कर रही है।

    बिहार चुनाव के प्रचार के दौरान विपक्षी गठबंधन द्वारा भी इस प्रकार की कई घोषणाओं की शुरुआत करने का वादा किया गया था। जिसमें बिहार के प्रत्येक परिवार में एक सरकारी नौकरी के साथ ही महिलाओं को साल भर की राशि एक मुश्त देने का भी वायदा किया गया था। लेकिन मतदाताओं ने विपक्षी गठबंधन के वादे पर भरोसा ना करते हुए सत्ताधारी गठबंधन द्वारा दी जा रही योजना पर अधिक भरोसा दिखलाया। कुछ इस तरह की योजनाओं में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड आदि राज्यों में सत्ताधारी दल ने सत्ता में वापसी की है। इसके बाद इस तरह की योजनाएं प्रत्येक राज्य में अपनाई जा रही है। हालांकि विपक्ष द्वारा इस प्रकार की योजनाओं को वोटो की खरीद बता रहा है।

ईवीएम के बाद वोट चोरी

    विपक्षी दलों ने चुनावी समर में मात खाए जाने के बाद वोट चोरी के आरोप लगाए जा रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के पूर्व विपक्षी दलों द्वारा ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ के आरोप लगाए गए थे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों के अच्छे प्रदर्शन के बाद यह मुद्दा ठंडा पड़ गया। और अब विपक्षी दल एसआईआर के बहाने वोट चोरी का मुद्दा उठा रहे हैं लेकिन बिहार चुनाव में यह मुद्दा पूरी तरह फेल साबित हुआ।

    अगर बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे गए हैं तो वो वास्तविक मतदाता सामने आकर अपना विरोध दर्ज क्यों नहीं करवा रहे हैं...?

    विपक्षी दलों को चाहिए कि, वो चुनाव में धांधली के आरोपो के बजाय वास्तविक जनहितैसी मुद्दे को उठाकर जनता का विश्वास पुनः जीतने का प्रयास करें। क्योंकि अंतिम निर्णय तो केवल जनता का ही रहता है।

    फ्री बीज की योजनाएं अर्थव्यवस्था के लिए घातक है और इन योजनाओं का भार अंतः आम आदमी पर ही पड़ता है। ऐसे में एंटीइनकम्बेंसी की काट भले ही इन फ्री बिज योजनाओं को बनाया जा रहा है लेकिन ये स्थाई समाधान नहीं है। राजनीतिक दलों को इन फ्री बिज योजनाओं की अपेक्षा ठोस विकासात्मक योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। क्योंकि ये योजनाएं भले ही तात्कालिक लाभ की दृष्टि से अच्छी कहीं जा सकती है लेकिन इनके दूरगामी निश्चित रूप से भयावही परिणाम हो सकते हैं। अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो आप किसी को रोटी देकर एक समय का पेट भर सकते हैं लेकिन यदि उन्हें कमाना सीखा दो तो वह स्वयं अपना पेट आजीवन भर सकता है।


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