Sunday, 24 ,May 2026
RNI No. MPHIN/2018/76422
: mahikigunj@gmail.com
Contact Info

HeadLines

माही की गूंजः खबर का असर | सप्ताह में दो दिन मुख्यालय पर तो एक दिन रात्रि विश्राम के कलेक्टर के आदेश पर पटवारियों में हलचल...? | जिले के हर कस्बे में चल रहे फर्जी आरओ वाटर प्लांट या फिर वाटर चिलर...? पेयजल गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं | वाह रे... सिस्टम जिंदा को मृत बताया... | संदिग्ध हालत में मिला युवक का शव, हत्या की आशंका | जन्मदिवस पर वर्षितप आराधकों को करवाये पारणें | जल जीवन जल मिशन में बनी पानी की टंकी में पानी ही नहीं पहुंचा | मासूम की हत्या और महिला पर जानलेवा हमले के एक सप्ताह बाद भी पुलिस के हाथ खाली | नगरपालिका ने खुद अतिक्रमण कर लाखों में बैच दी 52 गुमटियां | विडंबनाः झाबुआ जिले की भूमि पर बन रहा डेम, झाबुआ जिले की भूमि से ही काली मिट्टी ले जाकर किया जा रहा कार्य | आर्थिक संकट की आहट... या नाकामियों पर देशभक्ति का घूंघट...? | लवेश स्वर्णकार पर मामला दर्ज, सहमति के साथ शारीरिक संबंध या दुष्कर्म....? | अवैध रेत के व्यापार पर निरंकुश हुआ विभाग ओर प्रशासन | डॉ. शिव दयाल सिंह की जगह जिले के नए पुलिस कप्तान होंगे देवेंद्र पाटीदार | स्थाई समाधान नहींः अतिक्रमण के नाम पर नगरपालिका का हर बार एक नया ढकोसला | 4 हजार से अधिक ट्रैक्टर-ट्रॉली, डंपर भरकर तालाब में से मोरम-मिट्टी खनन होने तक गांधी जी के बंदर की तरह अंधा, गूंगा व बहरा बना हुआ था प्रशासन | नए ठेके शुरू होते ही ठेकेदार की लुट, शराब की बोतल पर लिखी कीमत से अधिक राशि की वसूली | यह कैसा सुशासनः दांत तोड़ दूंगा, और जिंदा गाड दूंगा...? | विपक्ष का संवैधानिक हक है विरोध करना... | 2 दिन से पड़ी मृत गाय कोई सुध लेने वाला नहीं |

क्या फ्री बीज योजनाएं एंटी इनकम्बेंसी की काट है...?
20, Nov 2025 6 months ago

image

माही की गूंज, झाबुआ डेस्क।

संजय भटेवरा

    लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है और जनता का निर्णय कभी गलत नहीं होता है, क्योंकि पब्लिक ईज ऑलवेज राइट। हाल ही में संपन्न हुए बिहार चुनाव के बाद देश में एक नई बहस ने जन्म ले लिया है वो यह है कि, क्या फ्री बीज योजनाएं एंटी इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) की काट है...?

    बिहार में पिछले दो दशक से सत्तारूढ़ गठबंधन ने न केवल सत्ता में वापसी की वरन पहले के मुकाबले और अधिक संख्याबल के साथ सरकार बना ली है। जिसके पीछे मुख्य कारण नीतीश कुमार सरकार की चुनाव की घोषणा से ठीक पहले महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपए देने के निर्णय का बताया जा रहा है। जिसके बाद यही कहा जा रहा है कि, इस तरह की मुफ्त की योजनाएं, सत्ता विरोधी लहर को सत्ता की लहर बनाने में सहायक हो रही है। पिछले कुछ चुनावो के परिणामों को देखे तो चुनावी राज्यों में तत्कालिक सरकार द्वारा महिलाओं को सीधे लाभ देने की योजनाओं का रहा है। जिसके बाद प्रत्येक चुनावी राज्य में इस तरह की योजनाएं गेम चेंजर की भूमिका में नजर आ रही है और सत्ता विरोधी लहर को बेअसर साबित कर रही है।

    बिहार चुनाव के प्रचार के दौरान विपक्षी गठबंधन द्वारा भी इस प्रकार की कई घोषणाओं की शुरुआत करने का वादा किया गया था। जिसमें बिहार के प्रत्येक परिवार में एक सरकारी नौकरी के साथ ही महिलाओं को साल भर की राशि एक मुश्त देने का भी वायदा किया गया था। लेकिन मतदाताओं ने विपक्षी गठबंधन के वादे पर भरोसा ना करते हुए सत्ताधारी गठबंधन द्वारा दी जा रही योजना पर अधिक भरोसा दिखलाया। कुछ इस तरह की योजनाओं में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड आदि राज्यों में सत्ताधारी दल ने सत्ता में वापसी की है। इसके बाद इस तरह की योजनाएं प्रत्येक राज्य में अपनाई जा रही है। हालांकि विपक्ष द्वारा इस प्रकार की योजनाओं को वोटो की खरीद बता रहा है।

ईवीएम के बाद वोट चोरी

    विपक्षी दलों ने चुनावी समर में मात खाए जाने के बाद वोट चोरी के आरोप लगाए जा रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के पूर्व विपक्षी दलों द्वारा ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ के आरोप लगाए गए थे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों के अच्छे प्रदर्शन के बाद यह मुद्दा ठंडा पड़ गया। और अब विपक्षी दल एसआईआर के बहाने वोट चोरी का मुद्दा उठा रहे हैं लेकिन बिहार चुनाव में यह मुद्दा पूरी तरह फेल साबित हुआ।

    अगर बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे गए हैं तो वो वास्तविक मतदाता सामने आकर अपना विरोध दर्ज क्यों नहीं करवा रहे हैं...?

    विपक्षी दलों को चाहिए कि, वो चुनाव में धांधली के आरोपो के बजाय वास्तविक जनहितैसी मुद्दे को उठाकर जनता का विश्वास पुनः जीतने का प्रयास करें। क्योंकि अंतिम निर्णय तो केवल जनता का ही रहता है।

    फ्री बीज की योजनाएं अर्थव्यवस्था के लिए घातक है और इन योजनाओं का भार अंतः आम आदमी पर ही पड़ता है। ऐसे में एंटीइनकम्बेंसी की काट भले ही इन फ्री बिज योजनाओं को बनाया जा रहा है लेकिन ये स्थाई समाधान नहीं है। राजनीतिक दलों को इन फ्री बिज योजनाओं की अपेक्षा ठोस विकासात्मक योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। क्योंकि ये योजनाएं भले ही तात्कालिक लाभ की दृष्टि से अच्छी कहीं जा सकती है लेकिन इनके दूरगामी निश्चित रूप से भयावही परिणाम हो सकते हैं। अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो आप किसी को रोटी देकर एक समय का पेट भर सकते हैं लेकिन यदि उन्हें कमाना सीखा दो तो वह स्वयं अपना पेट आजीवन भर सकता है।


माही की गूंज समाचार पत्र एवं न्यूज़ पोर्टल की एजेंसी, समाचार व विज्ञापन के लिए संपर्क करे... मो. 9589882798 |