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जनजातीय गौरव दिवस विशेष: धरती आबा भगवान "बिरसा मुंडा"
14, Nov 2024 1 year ago

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माही की गूंज, संजय भटेवरा।

     झाबुआ। झारखंड में अंग्रेजों के आने से पहले झारखंडियों का राज था ,लेकिन अंग्रेजी शासन लागू होने के बाद झारखंड के आदिवासियों को अपनी स्वतंत्र और स्वायतना को खतरा महसूस होने लगा। आदिवासी सैकड़ो सालों से जल, जंगल और जमीन के सहारे खुली हवा में अपना जीवन जीते  रहे हैं। आदिवासी समुदाय के बारे में यह माना जाता है कि, वह दूसरे समुदाय की अपेक्षा अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर ज्यादा संवेदनशील रहा है। इसलिए वह बाकी  चीजों को खोने की कीमत पर भी आजादी के एहसास को बचाने के लिए लड़ता और संघर्ष करता रहा है। अंग्रेजों ने जब आदिवासियों से उनके जल, जंगल और जमीन को छीनने की कोशिश की तो उलगुलान आदि आंदोलन हुआ। इस उलगुलान का ऐलान करने वाले बिरसा मुंडा ही थे। बिरसा मुंडा ने "अंग्रेजों अपने देश वापस जाओ" का नारा देकर उलगुलान का ठीक वैसे ही नेतृत्व किया, जैसा बाद में स्वतंत्रता की लड़ाई के दूसरे नायको ने इसी तरह के नारे देकर देशवासियों के भीतर जोश पैदा किया। खास बात यह रही की बिरसा मुंडा से पहले जितने भी विद्रोह हुए वह जमीन बचाने के लिए हुए। लेकिन बिरसा मुंडा ने तीन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उलगुलान किया। पहला वे जल, जंगल, जमीन जैसे संसाधनों की रक्षा करना चाहते थे। दूसरा नारी रक्षा और सुरक्षा तथा तीसरा वे अपने समाज की संस्कृति की मर्यादा को बनाए रखना चाहते थे।

       बिरसा मुंडा ने 1894 में अपने समाज को संगठित करके अंग्रेजों से लगान माफी के लिए आंदोलन चलाया। 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग केंद्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गई। जिसके बाद उन्होंने महसूस किया कि, विद्रोह के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। क्योंकि ब्रिटिश सरकार, सत्ता कानूनो की आड़ में आदिवासियों को घेर रही है और उनसे किसी राहत की मांग करना फिजूल है।

इतिहास गवाह है की 1897 से 1900 के बीच मुंडा आदिवासी और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे। 1897 में बिरसा मुंडा और उनके चार सौ साथियों ने तीर कमानो से खुरी थाने पर धावा बोला, तीर और कमान आदिवासियों के सबसे कारगर हथियार रहे।

     1898 में तांगा नदी के किनारे इनकी भिड़ंत हुई और अंग्रेजी सेना हार गई। बाद में उस इलाके में बहुत से आदिवासियों की गिरफ्तारियां हुई। जनवरी 1900 में डोमबॉडी पहाड़ी पर एक संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से बच्चे और महिलाएं भी मारे गए थे, उस जगह बिरसा मुंडा अपनी जनसभा संबोधित कर रहे थे। दरअसल बिरसा के जेल से आने के बाद अंग्रेजी सरकार ने समझ लिया था कि, बिरसा उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। उन्हें घेरने की हर संभव कोशिश भी बेकार साबित हो रही थी। इसलिए अंग्रेजी सरकार ने अभावो से जूझ रहे आदिवासियों को लालच देने के लिए रणनीति अपनाई। 4 फरवरी 1900 को जराइ केला के रोंगतो गांव के सात लोगों ने 500 रुपये के लालच में सोते हुए बिरसा को खाट सहित बांधकर बदगांव लाकर अंग्रेजों को सौंप दिया।

     अदालत में बिरसा पर झूठा मुकदमा चला और उन्हें जेल भेज दिया। वहां अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर दिया जिससे 9 जून 1900 को बिरसा की मृत्यु हो गई। अंग्रेजों ने आदिवासियों को गुमराह करने के लिए स्वाभाविक मृत्यु की झूठी खबर फैलाई।

      इस प्रकार धरती आबा और उलगुलान के नायक बिरसा मुंडा का संघर्ष  रूपी  जीवन मात्र 25 वर्ष तक ही चल पाया। लेकिन मात्र 25 वर्ष की आयु में ही बिरसा मुंडा वर्तमान में भगवान बिरसा मुंडा बन चुके हैं। और उनके जन्म दिवस को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा 2021 में केंद्र सरकार ने की थी।  तब से ही इस दिवस को पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।



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